
वेद प्रकाश/ऊधम सिंह नगर: हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वासुदेव द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है .यह दिन देव शयनी एकादशी का अनुसरण करता है और चतुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है. जो हिंदू पुराणों कथाओं के अनुसार चार पवित्र माह का संकेत देता है. इस दिन आषाढ़ -सावन-भाद्रपद और आश्विन के 4 महीनों में कठोर तप करने वाले भक्त भगवान श्री कृष्ण ओ मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं. मान्यता है कि इस दिन उपवास रखकर सच्चे मन से भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने से संतान की प्राप्ति होती है और संतान योग्य और कुशल होती है. जो भविष्य में अपना और अपने परिवार का नाम रोशन करती है.
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वासुदेव द्वादशी भी कहते हैं. वासुदेव द्वादशी तिथि 30 जून को पड़ेगी. इस दिन भगवान श्री कृष्ण और माता लक्ष्मी की पूजा से संतान की प्राप्ति होती है.इसलिए इस व्रत को विशेष रुप से वैवाहिक दंपति द्वारा रखा जाता हैं. वही कुछ भक्तों द्वारा घर में सुख-शांति के लिए भी वासुदेव द्वादशी का व्रत को किया जाता है.
वासुदेव द्वादशी का महत्व
न्यूज 18 लोकल से बातचीत करते हुए पंडित अरुणेश मिश्रा ने बताया कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वासुदेव द्वादशी भी कहा जाता है. यह दिन देवशयनी एकादशी का अनुसरण करता है और चतुर माह की शुरुआत का प्रतीक है. जो हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार 4 पवित्र मानसून माह का संकेत देता है. उन्होंने कहा कि आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन के चार महीनों में कठोर तपस्या करने वाले भक्त भगवान श्री कृष्ण और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है. इस दिन व्रत रखने से भक्तों को सुख समृद्धि प्राप्ति होती है और संतान प्राप्ति भी होती है.
कब प्रारंभ होगा वासुदेव द्वादशी का व्रत
पंडित अरुणेश मिश्रा ने बताया कि भगवान वासुदेव और माता देवकी ने पूरी श्रद्धा से आषाढ़ मास के शुक्ल की द्वादशी तिथि का व्रत रखा था. इसके कारण भगवान श्री कृष्ण के रुप में एक संतान हुई थी. चातुर्मास व्रत भी वासुदेव द्वादशी के साथ शुरु हो जाता है. उन्होंने कहा कि इस मास द्वादशी 30 जून 2023 को 02 बजकर 42 मिनट से 1 जुलाई 2023 को 01 बजकर 17 मिनट तक तक रहेगी.
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FIRST PUBLISHED : June 17, 2023, 23:19 IST






