
यह कहानी कमालपुर के एक छोटे से बच्चे पिंटू की है. पिंटू यों तो बड़ा अच्छा, प्यारा, भोला-भाला बच्चा था. एकदम गोलमटोल. हर वक्त खुश रहता और दूसरों को भी खुश रखता. लेकिन ऐसे प्यारे से पिंटू में भी एक गड़बड़ थी. उसे खब्त (सनक) था जूते चुराने का!
यह किसी भी ऐसी जगह जाता जहां बहुत से लोग इकट्ठे हुए हों, तो उसकी निगाह हमेशा उनके जूतों पर रहती थी. किसी के नए और बढ़िया जूते देखे, तो उन्हें लेकर चंपत हो जाता. अपने पुराने जूते वहीं छोड़ जाता. अक्सर तो लोगों को पता ही नहीं चल पाता था कि यह किसी की शरारत है. और अगर कभी पता भी चले, तो पिंटू साफ नाट जाता. तमककर कहता, “वाह, मैं क्या कोई जूता चोर हूं?” अब भला सामने वाला क्या कहे? उसे मन मसोसकर रह जाना होता.
एक दिन पिंटू एक दावत में गया. दावत शहर के एक बड़े रईस ने दी थी. इसलिए उसमें सैकड़ों लोग शामिल थे. पिंटू घर से ही सोचकर गया था, “आज की दावत में एक से एक अमीर लोग आएंगे. उनके जूते भी बढ़िया होंगे. बस, जो सबसे अच्छे जूते होंगे, उन्हें गायब कर दूंगा.”
दावत खत्म होने को थी कि तभी एक जगह उसे कुछ लोगों के जूते नजर आए. उनमें कत्थई रंग के चम-चम चमकते जूते उसे सबसे अच्छे लगे. उन पर चारों ओर फूल भी बने हुए थे. वे जूते धमाल पंपाल के थे. कौन भला उसे नहीं जानता? आखिर धमाल पंपाल कमालपुर का सबसे बढ़िया नाचने वाला था. “ये जूते मिल जाएं तो कहना ही क्या!” पिंटू ने इधर-उधर ताकते हुए मन-ही-मन कहा.
कुछ देर बाद उसने देखा कि आसपास किसी का ध्यान उसकी ओर नहीं है, तो वह वहां गया, जहां कत्थई रंग के फूलदार जूते पड़े थे. अपने जूते उतारकर उसने झटपट चम-चम करते, कत्थई जूते पहने. और मच-मच करता बाहर आ गया. फिर वह उछलता-कूदता हुआ सड़क पर चलने लगा.
सड़क पर ज्यादा भीड़ नहीं थी इसलिए भला उसे टोकता भी कौन? पिंटू को बहुत मजे आ रहे थे.
लेकिन थोड़ी देर बाद पिंटू को लगा कि नाच वह नहीं रहा, कोई और उसे नचा रहा है. कौन? उसे कोई नजर नहीं आया. पर उसे लगा कि वह खुद चाहे भी, तो अपने आपको नाचने से रोक नहीं सकता. उसके पैरों की गति बढ़ती जा रही थी और वह उछल-उछलकर नाच रहा था. हाथ हिला-हिलाकर नाच रहा था. इतनी तेजी से वह नाच रहा था कि सड़क पर चलने वाले रुक गए और हैरानी से उसे देखने लगे.
लोग सोचते थे कि थोड़ी देर बाद पिंटू का नाच खत्म हो जाएगा, तो वे उससे सड़क पर नाचने का कारण पूछेंगे. पर इसकी तो नौबत ही नहीं आई. इसलिए कि पिंटू का नाच हर क्षण तेज और तेज होता जा रहा था. यहां तक कि उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलछला आई थीं.
कोई घंटा भर हो गया था उसे नाचते हुए. इतने में हालत यह हुई कि सड़क पर ट्रैफिक पूरी तरह जाम हो गया. सड़क पर आने-जाने वाले लोग पिंटू के चारों ओर एक गोल घेरा बनाकर खड़े हो गए और हैरानी से उसका नाच देखने लगे. वे एक-दूसरे से पूछ रहे थे, “यह कौन लड़का है? इसे आज सड़क पर नाचने की क्या सूझी?”
इतने में कहीं दूर से आवाज आई, “जल्दी से पुलिस को बुलाओ, नहीं तो शाम तक हमें यहीं डटे रहना पड़ेगा. क्योंकि इस लड़के का नाच तो थमने वाला नहीं लगता.”
पुलिस का नाम सुनकर पिंटू डर गया. क्योंकि इससे उसकी जूतों की चोरी भी पकड़ी जाती. आखिर उसने वहां से भागने की सोची. उससे भागा नहीं जा रहा था. पर वह नाचते-नाचते ही दौड़ पड़ा. नाचता भी जा रहा था, भागता भी जा रहा था.
भागते-भागते वह एक स्कूल के मैदान में आ गया. बच्चों की अभी-अभी छुट्टी हुई थी और वे स्कूल से निकलकर अपने घर जा रहे थे. पर पिंटू को इतनी तेजी से नाचते देख वे ठिठक गए चिल्लाकर बोले, “चलो नाच देखें.”
अब तो हालत यह थी कि पिंटू नाच रहा था और उसके चारों ओर घेरा बनाकर स्कूल के पांच-सात सौ बच्चे तालियां बजा रहे थे. उनमें से कुछ बच्चे तरंग में आकर पिंटू के साथ-साथ ही नाचने लगे, पर वे भला पिंटू का क्या मुकाबला करते? पिंटू तो बिजली की सी तेजी से नाच रहा था. जिधर मुड़ता, उधर एक कौंध-सी नजर आती.
लोग कहने लगे, “ऐसा नाचने वाला तो हमने कोई नहीं देखा. सिर्फ कमालपुर के मशहूर नर्तक धमाल पंपाल में ही ऐसी कला है. लगता है, धमाल पंपाल की आत्मा इस लड़के में समा गई है.”
वे जब ये बातें कर रहे थे, तो उनके टुकड़े पिंटू के कान में भी जा रहे थे. उसने मानो चीखकर कहना चाहा, “भाई, धमाल पंपाल की आत्मा नहीं, धमाल पंपाल के जूते मेरे पैरों आ गए हैं. वे जूते ही मुझे इस बुरी तरह नाच नचा रहे हैं.”
मगर नाचते-नाचते वह इस बुरी तरह हाँफ रहा था कि कोई शब्द ही उसके मुंह से पूरी तरह नहीं निकल रहा था. बहुत जोर लगाने के बाद भी वह इतना ही कह पाया, “मुझे बचाओ, मेरे जूते….!”
बच्चों ने समझा, पिंटू कोई बढ़िया नाटक कर रहा है. वे और जोर-जोर से तालियां बजा-बजाकर उसका जोश बढ़ाने लगे. उधर पिंटू थकान के मारे चूर हो चुका था. उसका सारा शरीर पसीने-पसीने था. दांत भिंच गए थे. मगर देखने वाले बच्चे उछल-उछलकर यही कह रहे थे, “देखो कितना खुश है यह नाचने वाला बालक. कितने मजे में हँस रहा है!”
और वे चिल्लाकर कहते, “नाचो, भाई नाचो खूब नाचो, दिन भर नाचते रहो.”
पिंटू ने एक बार फिर पूरा जोर लगाकर कहना चाहा, “भाई, मुझे बचा लो. ये जूते मेरे प्राण ले लेंगे. किसी तरह इन्हें उतार दो!”
पर उसके मुंह से आवाज निकली ही नहीं और उसके मन की बात तालियां बजाती, उछलती-कूदती बच्चों की भीड़ भला क्या समझती? लिहाजा पिंटू ने वहां से भाग लेने में ही खैरियत समझी. आगे-आगे पिंटू, पीछे-पीछे तालियां बजाते बच्चे. पिंटू देर तक भागता रहा, भागता रहा और आखिर एक खेत की ओर मुड़ गया. हारकर बच्चे अपने-अपने घरों की ओर चले गए.
लेकिन खेत में जाकर भी पिंटू को कुछ चैन न पड़ा. खेत में कटी हुई फसल एक ओर पड़ी थी, घास-फूस, तिनके भी थे. वे उसकी टांगों में चुभ रहे थे. जगह-जगह से खून निकल आया था. वह पूरा जोर लगाकर खुद को नाचने से रोक रहा था, लेकिन पैर थे कि रुक ही नहीं रहे थे.
कुछ दूरी पर बैठे किसान यह नजारा देख रहे थे. पिंटू का नाच देखकर वे पास आए और बोले, “साहबजादे, तुम नाचते तो अच्छा हो. पर यहां खेतो में कौन तुम्हारी कला समझेगा? अच्छा हो, किसी मंच पर अपनी कला दिखाओ.”
पिंटू ने बुरी तरह हांफते हुए कहा, “मैं, जूते….!”
“हां-हां, जूते…! जूते तो तुम्हारे सुंदर हैं और वे तुमने पहने हुए हैं. कौन ले गया उन्हें, जो परेशान होते हो?”
पिंटू भला उन्हें क्या समझाता कि इन जूतों की भी एक कहानी है. वह कुछ कहना चाहता था, नहीं कह पाया. जमीन पर गिरा और बेहोश हो गया. इतने में एक बूढ़े किसान ने कहा, “भई, पंखा लाकर थोड़ी हवा करो. लगता है, नाचते-नाचते यह थक गया है.”
कुछ लोग पंखा लेकर आए और हवा करने लगे. कुछ ने पिंटू के मुंह में थोड़ा पानी डाला. पिंटू को हलका-सा होश आया तो बोला, “जूते…!” और फिर बेहोश हो गया.
बूढ़े किसान ने कहा, “लगता है, इन जूतों ने ही बालक को परेशान कर रहा है. हो सकता है, ये इसे बुरी तरह काट रहे हों! तो इन जूतों को उतारो.”
सबने बड़ा जोर लगाया, तब कहीं वे जूते उतर पाए. लगता था कि पैर से चिपक ही गए हों. लेकिन जूते उतरते ही पिंटू को फौरन होश आ गया. उसके चेहरे पर चैन दिखाई पड़ने लगाॉ. एकदम उछलकर खड़ा हो गया. बोला, “जूते….! नाचने वाले जूते!”
“अरे बेटे, जूते पड़े होंगे कहीं. नाहक परेशान होते हो. यहां से तुम्हारे जूते कोई ले थोड़े ही जाएगा.” बूढ़े किसान ने कहा.
मगर तभी दूसरे किसान का ध्यान भी पिंटू के जूतों की ओर गया. वहां दूर-दूर तक जूते नजर नहीं आ रहे थे. अभी-अभी तो यहीं पड़े थे। उन्हें ले कौन गया?
जब सारे किसान मिलकर जूते ढूंढ रहे थे, तो उन्हें जूते तो नहीं मिले. हां, एक छोटी-सी तख्ती जरूर मिली. उस पर सुनहरे अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था. बूढ़े किसान ने वह तख्ती पिंटू की ओर बढ़ा दी. बोला, “बेटा हम तो पढ़ नहीं पाएंगे। तुम ही पढ़कर बताओ, भला क्या लिखा है इसमें?”
पिंटू ने वह तख्ती पढ़ी, तो उसका चेहरा फक पड़ गया. उस पर लिखा था- “पिंटू प्यारे, देख लिया न जूतों का कमाल! उम्मीद है, अब तुम किसी के जूते नहीं चुराओगे. शुभकामनाओं सहित- तुम्हारा धमाल पंपाल.”
पिंटू को यों अचकचाया देख, किसान भी हैरान थे. बोले, “तुमने बताया नहीं बेटा, क्या लिखा है इसमें?”
“आपको समझ में नहीं आएगा. चलिए, अब मैं पूरी कहानी ही सुनाता हूं”. कहते-कहते पिंटू ने उन किसानों को चोरी के जूतों का पूरा किस्सा सुनाया. और साथ ही वहीं बैठकर यह प्रतिज्ञा भी की कि वह आगे से अपनी यह सनक छोड़ देगा.
पुस्तकः धमाल पंपाल के जूते (बाल कहानी संग्रह)
लेखकः प्रकाश मनु
प्रकाशकः साहित्य अकादमी
मूल्यः 125 रुपये
.
Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 17, 2023, 20:03 IST






