Children Literature: विश्व बाल साहित्य के कालजयी लेखक हैंस एंडरसन- हरिकृष्ण देवसरे


“हैंस एंडरसन आज विश्व बाल साहित्य के कालजयी लेखक के रूप में विख्यात है. वह ऑस्करवाइल्ड जैसा नहीं था जिसे सब जानते हैं, लेकिन कोई नहीं पढ़ता है. इसके विपरीत हैंस एंडरसन को सब पढ़ते हैं, सब प्यार करते हैं, लेकिन कोई नहीं जानता.” डेनिश भाषा के विद्वान और हैंस एंडरसन के कथा-साहित्य के मर्मज्ञ एवं समालोचक एर्लिंग नीलसेन का यह वक्तव्य, हैंस एंडरसन की कहानियों की लोकप्रियता को तो प्रमाणित करता ही है, यह भी इंगित करता है कि एक व्यक्ति और एक रचनाकार के रूप में एंडरसन को शायद उतना नहीं जाना गया. ऐसा शायद हर उस बात के लिए होता है जो हमारे लिए बहुपरिचित हो जाती है. यदि हैंस एंडरसन के शब्दों में कहें तो “यह दुनिया चमत्कारों और अचरजों से भरी है, लेकिन हम उनके बारे में बहुत कम जानते हैं, क्योंकि वे हमारे दैनिक जीवन का अंग बन गये हैं.” हैंस क्रिश्चियन एंडरसन भी परीकथा लोक के एक आश्चर्यजनक नक्षत्र के रूप में विश्व – बाल साहित्य के गगन में आज भी प्रकाशमान् है. उसके कथा-संसार को विश्वभर के बच्चों ने अपना बना लिया है और सौ से अधिक भाषाओं में उसके अनुवादों को वे बच्चे पिछले डेढ़ सौ सालों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पढ़ते आ रहे हैं. निश्चित ही, ऐसे रचनाकार के व्यक्तित्व और उसकी रचनाधर्मिता को जानना तो और भी रोचक होना चाहिए, विशेषतः तब, जबकि स्वयं हैंस एंडरसन ने अपने जीवन को ही एक ‘परीकथा’ कहा हो.

यह विडम्बना ही है कि भारतीय बाल-साहित्य में परीकथाओं के स्वरूप और उनकी रचना के संबंध में आज भी भ्रम बना हुआ है. परीकथा उसे माना जाता है कि जिसकी पात्र कोई ‘परी’ हो या ‘परीकथा’ का स्वप्निल-संसार केवल काल्पनिक होता है और उसका यथार्थ से कोई संबंध नहीं होता. यह भी कि ‘परीकथा’ में हर असम्भव को सम्भव बनाकर प्रस्तुत किया जाता है. हैंस एंडरसन के सामने भी परीकथाओं की बहुत-कुछ ऐसी ही व्याख्याएं आई थीं – विशेषरूप से लोक-साहित्य में प्रचलित कथाओं के बारे में. किन्तु हैंस एंडरसन ने परीकथाओं को व्यापक अर्थों और सन्दर्भों में देखा और रखा. उन्हें एक नई परिभाषा दी, जो उन कहानियों के कल्पना लोक के सृजन को, यथार्थ के धरातल की अनिवार्यता पर बल देती है. हैंस एंडरसन ने स्वयं जिन मौलिक परीकथाओं का सृजन किया, उन्हें यथार्थ के धरातल से ही कल्पनालोक तक पहुंचाया और विश्व बाल साहित्य के समालोचकों के अनुसार हैंस एंडरसन की सफलता और उसकी कहानियों की विश्वव्यापी स्वीकृति का यही मुख्य आधार था.

हैंस एंडरसन की छिटपुट कहानियां तो लगभग सभी भारतीय भाषाओं की पत्रिकाओं में अनूदित होकर छपती रही हैं; कुछ छोटी-छोटी किताबें भी छपीं; लेकिन विश्व बालसाहित्य के इस अनमोल खजाने को समग्र रूप में भारतीय बच्चों के हाथों में देने का कोई उल्लेखनीय प्रयास नहीं हुआ.

हैंस एंडरसन की कहानियों की सार्थकता आज भी इसलिए है, क्योंकि उन्होंने इनके माध्यम से मानवता, सच्चाई, निष्ठा और ईमानदारी जैसे शाश्वत मूल्यो की स्थापना की. वह अपने को न तो ‘उपदेशक’ मानते थे, न ही ‘उपदेश’ देने में उन्होंने कभी विश्वास किया. वह तो इस संसार के सौन्दर्य-बोध और मानवीय संबंधों की पवित्रता के प्रति समर्पित थे. और उनकी कहानियों में समाये इन्हीं शाश्वत मूल्यों के कारण, वे जितना पिछली डेढ़ शताब्दी के लिए ज़रूरी थीं, उतना ही आने वाली शताब्दी के लिए ज़रूरी होंगी. आज विश्व में हथियारों की दौड़, हिंसा, बढ़ती स्पर्धा, युद्ध और इन्सान-इन्सान के बीच गहरी होती खाई सबकी चिन्ता का विषय हैं. ऐसे माहौल में मानव जीवन के कोमल-विचारों और मानवता के स्पंदन के लिए हैंस एंडरसन की परीकथाएं अपना विशिष्ट महत्त्व रखती हैं.

हैंस एंडरसन की कहानियों की मूल विशेषता यह है कि वह परियों के बीच रहकर भी आज के यथार्थ में जीते हैं और उसी यथार्थ के सहारे वह कल्पना लोक का ऐसा ताना-बाना तैयार करते हैं कि वह अविश्वसनीय होकर भी विश्वसनीय बन जाता है. वह एक ही कहानी में यथार्थ चित्रण करते-करते बड़ी निपुणता से पाठक को स्वप्निल लोक में विचरण कराने लगते हैं और विशेष बात ये है कि पाठक उसे अविश्वसनीय समझकर भी उसकी छद्म- विश्वसनीयता का आनंद लेता है. ‘बर्फ की रानी’ कहानी में हैंस एंडरसन जिस तरह से लौकिक-जगत से अलौकिक जगत में प्रवेश कर जाते हैं, और फिर वापस लौकिक जगत में आ जाते हैं- यह उनकी परीकथा-लेखन की विलक्षण प्रतिभा का ही कौशल था.

लेकिन हैंस एंडरसन एक रात में या किसी जादू के कारण परीकथा लेखक नहीं बन गये थे. उन्होंने तो सपने में भी न सोचा था कि एक दिन परीकथाएं उनके लिए विश्व में प्रसिद्धि का द्वार खोल देंगी. इसके विपरीत, अपनी प्रारम्भिक परीकथाओं को वह अपनी बड़ी ही ‘तुच्छ’ रचनाएं मानते थे. हैंस एंडरसन के समकालीन, इलेक्ट्रो मैग्नेटिज़्म के आविष्कारक ओर्स्टेड ने कहा भी था – “अगर तुम्हारे उपन्यासों ने तुम्हें प्रसिद्धि दी है, तो तुम्हारी परीकथाएं तुम्हें अमर बना देने वाली हैं.” – एंडरसन को इस बात को पढ़कर बुरा लगा था. लेकिन बाद में ओर्स्टेड की बात ही सच निकली.

यह सही है कि हैंस एंडरसन परीकथाएं लिखने वाला पहला लेखक नहीं था, किन्तु तब की परीकथाएं लोगों से मौखिक सुनकर लिखी जाती थीं- बल्कि ज्यों की त्यों प्रस्तुत कर दी जाती थीं. (यहाँ यह लिखना अप्रासंगिक न होगा कि हमारे यहां आज भी अधिकांश कथाएँ लोग अपने बचपन की सुनी कथाओं का पुनर्लेखन करके प्रस्तुत करते हैं या विदेशी लोककथाओं को पढ़कर उनका भारतीयकरण कर देते हैं. ऐसी परीकथाओं और कहानियों को मौलिक-बालसाहित्य कहकर, भुनाने की प्रवृत्ति पिछले पचास वर्षों से चल रही है और यही कारण है कि बाल कथा-साहित्य ऐसी रचनाओं के ढेर से भरा पड़ा है और उसके नीचे मौलिक बालकथाएं दबकर रह गयी हैं.)

हैंस एंडरसन का परीकथाओं के बारे में जो मौलिक और अधिक व्यापक चिन्तन था वह फ्रांस और जर्मनी के परीकथा लेखकों- यहां तक कि ग्रिम-बंधुओं से भी एकदम भिन्न और कहीं अधिक साहित्यिक तथा कल्पना-संपन्न था. उनकी परीकथाओं का रचना-संसार यथार्थ की आधारशिला पर टिका था, प्राचीन परीकथाओं और लोककथाओं की तरह कपोल कल्पनाओं पर नहीं.

हैंस एंडरसन की प्रारंभिक परीकथाओं पर (मौलिकता के बावजूद) ‘अरेबियन नाइट्स’ (अलिफ़लैला) जैसी कहानियों का प्रभाव था जिन्हें उन्होंने अपने पिता से बचपन में सुना था. बाद में जब उन्होंने अपनी साहित्य-रचना का लक्ष्य ‘परीकथा लेखन’ बनाया तो उनके बारे में उन्होंने मौलिक ढंग से सोचा और परीकथाओं के व्यापक स्वरूप तथा उनकी काव्यात्मक परिधि को गहराई से पहचाना, जो न तो उनके किसी समकालीन लेखक ने पहचानी और न ही बाद के लेखकों ने. यही कारण है कि हैंस एंडरसन आज तक मौलिक परीकथा लेखन का अकेला ‘सम्राट’ है.

हैंस एंडरसन ने जो प्रारंभिक परीकथाएं अपनी रचनात्मक प्रतिभा के फलस्वरूप लिखीं उन्हें पाठकों ने भी सराहा और साहित्य समालोचकों ने भी. इससे एंडरसन को जो प्रोत्साहन और प्रशंसा मिली वह उनके लिए भविष्य का मार्ग निर्धारित करने में सहायक बनी और हैंस एंडरसन परीकथाओं के मौलिक लेखन की सम्भावनाओं को अधिक गम्भीरता और गहराई से समझ सके. लेकिन उन्होंने परीकथाओं और अपनी कहानियों में विचारों और मौलिक अभिव्यक्ति का अंतर अवश्य रखा, और इस कारण उनकी बाद की बहुत-सी कहानियां केवल बच्चों के लिए नहीं लिखी गईं, बल्कि बड़ों के लिए भी उनमें काफी कुछ समझने के लिए लिखा गया था. उन्होंने लिखा है- “मैं अपनी परीकथाओं में किसी विचार को बड़ों के लिए विकसित करता हूं, फिर उसे बच्चों के अनुरूप ढालकर उन्हें सुनाता हूं और यह भी मानकर चलता हूं कि उस समय उस विचार को उनके माता-पिता भी सुन रहे हैं और वे भी उसके बारे में अपने तरीके से सोचेंगे.”

हैंस एंडरसन की दृष्टि में परीकथाएं, कविता का ऐसा विस्तार हैं, जिसकी परिधि में “भयानक रक्त पीने वाली गुफाओं” से लेकर बालसुलभ किंवदंतियां, लोकसाहित्य और ‘कलात्मक-साहित्य’- सभी आ जाते हैं. हैंस एंडरसन मानते थे- “परीकथाएं तो मेरे लिए काव्य की सम्पूर्णता का प्रतीक हैं-और जिसने इनकी रचना में दक्षता प्राप्त कर ली है, उसे इन कथाओं में सुख-दुख, आनंद, नवीनता, विडम्बना, हास्य आदि सभी को आवश्यकतानुसार, उचित तरीके से अभिव्यक्त करने में सक्षम होना चाहिए. इन सबके साथ जहां कहानी में काव्य का सूत्र निरन्तर चलता रहना चाहिए, वहीं बालसुलभ कल्पनाशीलता और सहज वर्णनात्मक भाषा और भावाभिव्यक्ति भी उसका अनिवार्य तत्त्व है.”

परीकथाओं के बारे में अपने इन्हीं विचारों के आधार पर हैंस एंडरसन ने जो प्रारम्भिक कहानियां लिखीं, उनका मूल कथानक भले ही उन्होंने लोकसाहित्य से लिया और उसे उसी तरह रखा भी, किन्तु उन्हें लिखते समय उन्होंने, अपनी प्रतिभा, लेखन-कौशल और अपने चिन्तन के द्वारा उन्हें नया रूप दे दिया- या कह सकते हैं कि वे उनकी मौलिक उद्भावना के रूप में प्रस्तुत हुईं. उनकी प्रारम्भिक परीकथाओं में एक प्रसिद्ध कहानी है- ‘चकमक डिबिया’ (दि टिंडर बॉक्स). लोककथाओं में प्रायः तीन की संख्या को अशुभ माना गया है. एंडरसन ने जहां कहानी में कुत्तों की संख्या तीन ही रखी, वहीं उन्होंने उसके ‘मिथक’ को तोड़ते हुए उन कुत्तों के आकार और रूप में परिवर्तन कर दिया और स्वभाव में सबसे अधिक मददगार के रूप में प्रस्तुत किया. उन कुत्तों के स्वरूप की कल्पना करते हुए उन्होंने एक की आंखों को चाय के प्यालों जैसा, दूसरे की आंखों को गाड़ी के पहिये के बराबर और तीसरे की आंखों को किसी बड़े गुम्बद जैसा बताया. यह एंडरसन की काव्यात्मक परिधि के विस्तार की अभिव्यक्ति है. कहानी के अन्त में वे कुत्ते और सिपाही की सहायता करते हैं. सिपाही का राजकुमारी से विवाह हो जाता है. एंडरसन चाहते तो काम ख़त्म हो जाने पर उन कुत्तों को वापस भेज सकते थे लेकिन ऐसा करना न केवल कुत्तों के साथ अन्याय होता, बल्कि सिपाही के चरित्र की कृतग्नता सिद्ध होती. इसलिए उन्होंने विवाह के बाद खाने की मेज पर तीनों कुत्तों को दावत खाते हुए प्रस्तुत किया, जो कि अधिक न्यायसंगत और प्रशंसनीय बात थी.

प्राचीन लोककथाओं में दृश्य चित्रण नाममात्र को होता है. उनमें किसी स्थान, प्राकृतिक दृश्य, या भवन के वैभव और उसकी सुन्दरता का वर्णन विस्तार से नहीं होता. दरअसल लोककथा सुनने वालों में इतना धैर्य नहीं होता था कि वे स्थान, दृश्य या भवन के वर्णन में उलझ जाएं और कथा के रोमांच और औत्सुक्य में बाधा पड़े. कथा सुनाने वालों में भी वह वर्णन कौशल नहीं होता था कि वह अपने श्रोता को बांधकर रख सके. इसलिए वह मान कर चलता था कि श्रोता उस दृश्य वर्णन की कल्पना स्वयं कर लेगा. हैंस एंडरसन ने इस सत्य को भली-भांति समझा था और इसलिए उन्होंने अपनी परीकथाओं में चाहे वे किसी लोककथा के आधार पर – लिखी गयी हों या उनकी वह मौलिक रचना हो- चित्रोपमता को विशेष महत्त्व दिया. चाहे कोई स्थान हो, दृश्य हो या भवन हो एंडरसन ने उसका वर्णन इतनी खूबी से किया कि पाठक मूलकथा के रोमांच और उत्सुकता से जुड़ा रहकर भी उसका आनंद प्राप्त करे.

हैंस एंडरसन के बारे में आलोचकों ने लिखा है कि वह एक ऐसा पौधा था जो चारों ओर से दूसरे पेड़ों द्वारा आच्छादित होने के बावजूद इस तरह विकसित हुआ कि उसकी रचनाओं के आस्वाद से बड़े-से-बड़े साहित्य-मर्मज्ञ भी अभिभूत हो उठे. हैंस एंडरसन ने परीकथा लेखन में जो यश प्राप्त किया वह स्वयं उनके लिए बड़ा आश्चर्यजनक था, क्योंकि यह स्वभाव से अत्यन्त भाग्यवादी थे और वह यह भी मानते थे कि वह एक असफल इन्सान हैं. लेकिन जब उन्हें सफलता के दर्शन हुए और उन्होंने अपने समय में व्याप्त वर्ग-भेद के विचारों को तोड़कर, अपनी बुद्धिमत्ता और चिन्तन द्वारा लोगों को प्रभावित किया तो वे उसका सम्मान करने लगे. लेकिन हैंस एंडरसन का भाग्य पर विश्वास बराबर बना रहा. भाग्य के प्रति उनका यह विश्वास उनकी कहानी ‘चकमक डिबिया’, ‘सफर का साथी’ आदि में देखा जा सकता है. लेकिन एंडरसन जहां जीवन के प्रति आशावान थे, वहीं वह जीवन के दूसरे पक्ष यानी निराशा के प्रति भी उतना ही सजग थे और उसकी अभिव्यक्ति उनकी कहानियों- ‘माचिस वाली बच्ची’, ‘बोतल का मुंह’ में साफ-साफ दीखती है.

हैंस एंडरसन ने अपने ही देश के दार्शनिक कीर्केगार्द की तरह किसी ‘दर्शन’ का प्रतिपादन नहीं किया. एंडरसन के पास ऐसा कोई दार्शनिक विचार था भी नहीं. वह तो समूचे विश्व को, इस धरती को, आकाश को एक अलौकिक चमत्कार और अचरज लोक के रूप में देखते थे. उनकी परीकथाएं भी इसीलिए इसी धरती की कहानियां हैं. वह इस पूरी सृष्टि के प्रति बड़े आस्थावान थे. जीवन को वह वरदान मानते थे और उसे भरपूर जीने में विश्वास करते थे. ‘बूढ़े शाहबलूत का सपना’ कहानी में इफीमेरा मक्खी को अपना एक दिन का जीवन पूरे आनंद से जीते हुए दिखाने के पीछे एंडरसन की यही सोच थी.

बहुत-से लोग अपने वर्तमान के प्रति असन्तुष्ट रहते हैं, उन्हें ख़ुशी के जो भी क्षण मिलते हैं-उन्हें पूरी तरह नहीं भोगते हैं और भविष्य में कुछ और अच्छा होगा इसी आशा में जीवन गंवा देते हैं. ‘देवदारू का पेड़’ में एंडरसन ने ऐसे ही लोगों की मनोभावनाओं को अभिव्यक्त किया है- “और सब ख़तम… ख़तम… और हर कहानी का अन्त यही होता है.”

हैंस एंडरसन की ईश्वर और धर्म के प्रति गहरी आस्था थी. अपनी कहानियों में उन्होंने ईश्वर के प्रति विश्वास और धर्म के शाश्वत मूल्यों को भी, बच्चों की कोमल अनुभूतियों के अनुकूल बनाकर व्यक्त किया है. इसके पीछे उनका यही उद्देश्य था कि बच्चों में न केवल अच्छे संस्कार और आस्थाएं जन्म लें, बल्कि बड़े होने पर उनमें मानवीय गुण भी सहज रूप में विकसित हो. एंडरसन की कहानियों में नैतिक एवं मानवीय गुणों को सहज अभिव्यक्ति मिली है. ‘बूढ़े शाहबलूत का आखिरी सपना’ कहानी में जब क्रिसमस की पूर्व-रात्रि में आये तूफान से, जहाज़ों को किनारे आने का मार्ग-संकेत देने वाला विशाल शाहबलूत का पेड़ गिर जाता है तो उसके फैले बड़े शरीर के ऊपर, जहाज़ से आता हुआ गीत गूंजता है- क्रिसमस की खुशी का गीत और परमात्मा के रक्त से मानव-आत्मा की अमरता और मुक्ति का गौत- “गाओ ज़ोर से, आज की सुबह सार्थक है सब कुछ, पैदा हुआ है वह.’ ‘दो भाई’ कहानी में मां अपने बच्चों को सच्चाई की राह पर चलने की शिक्षा देती हैजो प्रभु यीशू का सन्देश था. जब एक भाई उस जैकब की कथा पढ़ता है जिसने भेड़ की खाल पहनकर अपने भाई यीशु को जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करने की कोशिश की थी तो उस धोखेबाज़ के खिलाफ उस भाई की नन्हीं मुट्टियां हवा में तन जाती हैं. एक दूसरी कहानी- ‘दुनिया का सबसे सुन्दर गुलाब’ में बीमार रानी को बचाने के लिए जिस सबसे सुन्दर गुलाब की तलाश होती है, उसे एक बच्चा, एक खुली हुई किताब के रूप में लेकर आता है और मां के बिस्तर के पास बैठकर वह ‘उस प्रभु’ की किताब को पढ़ने लगता है, जो मानव जाति और भावी समाज को बचाने के लिए सलीब पर चढ़ गया था. तब रानी को किताब के पन्नों मैं दुनिया का सबसे सुन्दर गुलाब दिखायी दिया जो सलीब पर चढ़ गया था. ‘प्रेम ही सबसे बड़ा है’, वह बोली, “जिसके पास दुनिया का यह सबसे सुन्दर गुलाब है, वह कभी नहीं मरेगा.” ‘लाल जूते’ कहानी में चर्च में लाल जूते पहनकर जाने बाली लड़की कॉरेन को अन्त में अपने पापों का प्रायश्चित्त करना पड़ता है. जब कॉरेन ने सच्चे मन से कहा- “हे ईश्वर, मेरी मदद करो”, तब देवदूत ने आकर उसे शान्ति और खुशी का संगीत सुनाया. उसके बाद फिर कभी किसी ने लाल जूते नहीं मांगे. ‘एक मां की कहानी’ में मां की ममता की पराकाष्ठा और मृत्यु के शाश्वत सत्य को बड़े ही मार्मिक रूप से एंडरसन ने प्रस्तुत किया है. साथ ही ईसाइयों में प्रचलित, बच्चों की अकाल मृत्यु और स्वर्ग लोक की मान्यता का चित्रण भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है. इसी मान्यता को ‘देवदूत’ कहानी में भी अभिव्यक्ति किया गया है कि जिन बच्चों की मृत्यु जल्दी हो जाती है उन्हें ‘ईश्वर’ देवदूत बना देता है. एंडरसन ने जिस तत्कालीन समाज की जीवन शैली और मान्यताओं के अनुरूप ये कहानियां लिखी हैं, उसका ये धार्मिक विश्वास और आस्थाएं एक अनिवार्य अंग रही हैं और इस कारण एंडरसन की कहानियों में उनको अभिव्यक्ति मिलना सहज और स्वाभाविक रहा है. निश्चय ही इसके पीछे ईसाईयत या धर्म का प्रचार नहीं बल्कि विश्वजनीन मानव-प्रेम, मानवीय सद्गुणों और नैतिकता के – प्रति बाल-पाठकों के मन को तैयार करने का प्रयास रहा है.

हैंस एंडरसन की हरेक परीकथा और कहानियों की शैली अलग-अलग है. किसी कथा में उनका स्वर व्यंग्यात्मक है, तो किसी में भावात्मक, तो किसी में वह जीवन के प्रति अतियथार्थवादी हैं. लेकिन इन सभी के चित्रण में उन्होंने कथा की रोचकता की पूरी रक्षा की है. उन्होंने गम्भीर से गम्भीर बात को भी रोचक बनाया है. इसका एक कारण यह भी था कि उनकी अधिकांश कथाएं, उनके अपने जीवन और अनुभवों से उपजी थीं. डेनिश भाषा के विद्वान हैंस ब्रिक्स के अनुसार, “हर कहानी में लेखक के दिल के ख़ून का एक कतरा मौजूद है और इसीलिए वे कहानियां सदा ही रोचक और तरोताजा महसूस होती हैं.” अपनी बहुत-सी कहानियों के पात्रों के माध्यम से एंडरसन ने अपने को प्रस्तुत और अभिव्यक्त किया है. ‘समुद्र कन्या’ कहानी में वह राजकुमार हैं. ‘देवदारू का पेड़’ में अपने अभावग्रस्त जीवन की सोच को प्रस्तुत करते हैं. ‘प्रेमी’ कहानी में वह लट्टू हैं, जिसके प्रेम प्रस्ताव को ठुकराने वाली गेंद एक दिन अंत में गटर में उपेक्षित पड़ी रहती है. ‘बतख का बदसूरत बच्चा’ हैंस एंडरसन की अपने स्वयं के बारे में ही कहानी है क्योंकि वह अपने को बदसूरत मानते थे. इसी तरह ‘चक्रमक डिबिया’, ‘टीन का सिपाही’ आदि कहानियों में नायक की विजय एंडरसन की अपनी विजय है. एंडरसन एक असफल प्रेमी भी रहे. अपने उस अभाव की पूर्ति उन्होंने इन कहानियों के माध्यम से की जिनमें नायक विजयी होकर राजकुमारी या प्रेमिका को प्राप्त कर लेता है. उनकी अन्तिम प्रेमिका जेनी-लिंड के लिए लिखी गई कहानी ‘बुलबुल’ भी उनके प्रेमी मन की अभिव्यक्ति है. हैंस एंडरसन आजीवन अविवाहित और एकाकी रहे. अपने इस एकाकीपन की अभिव्यक्ति के रूप में उन्होंने एकाकी चरित्रोंवाली कहानियां लिखी- ‘शैतान ‘बच्चा’ में वह कवि हैं जिसके सीने के आरपार तीर मारकर कामदेव चला जाता है. ‘पुराना घर’ में वह अकेला बूढ़ा आदमी हैं. ‘बोतल का मुंह’ में वह अकेली दुखी बूढ़ी औरत हैं; और ‘तितली’ में एक फूल से दूसरे फूल पर भटकने वाले और कहीं न टिक पाने वाले चरित्र के रूप में हैं.

हैंस एंडरसन की ये कालजयी कहानियां बच्चों के कोमल मन को स्पर्श कर उसे गुदगुदाती हैं, सहलाती हैं, प्यार करती हैं, हँसाती हैं और अद्भुत कल्पनालोक की सैर कराकर वापस धरती पर ले आती हैं- क्योंकि सच तो यथार्थ ही है और वह इस धरती पर है- सृष्टि के रूप में जिसकी सुन्दरता चारों ओर फैली है. हैंस एंडरसन ने अपनी इन कहानियों के द्वारा बच्चों को सृष्टि से, इनसान से, सबसे प्रेम करना सिखाया है-उनकी संवेदनशीलता को बढ़ाया है ताकि वे एक अच्छे इनसान बनें और इस दुनिया को बहुत खूबसूरत और प्यारभरी बनाएं.

इस संचयन में हैंस एंडरसन की श्रेष्ठ कहानियां प्रस्तुत की गयी हैं. ओर्स्टेड ने कहा था कि ये परीकथाएं एंडरसन को अमर बना देंगी. पाठक स्वयं निर्णय करें कि किसने किसे अमर बनाया- कहानियों ने एंडरसन को या रचनाकार एंडरसन ने कहानियों को.

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Author: Jagran Times

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