New Study: बीयर के भरे हुए गिलास में अगर मूंगफली का दाना डाला जाए तो वो पहले नीचे जाएगा, फिर ऊपर आ जाएगा. इसके बाद मूंगफली का दाना बीयर की ऊपरी सतह पर इधर-उधर भागने लगता है. कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? वैज्ञानिकों ने इसका कारण पता लगाने की कोशिश की है. जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक शोध में ये भी जानने की कोशिश की है कि अगर बीयर में मूंगफली के दाने के नाचने की प्रक्रिया का पता लगा लिया जाए तो धरती के अंदर से मिनरल्स निकालने और सतह के नीचे उबलते मैग्मा को समझने में कैसे मदद मिलेगी?
जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा है कि मूंगफली के बीयर में नाचने को समझने के लिए किए गए शोध का कई उद्योगों में फायदा लिया जा सकता है. ब्राजील के शोधकर्ता लुई परेरा के मुताबिक, उन्हें इस शोध के बारे में पहली बार ख्याल अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में एक बार में आया. दरअसल, ब्यूनस आयर्स में बार टेंडर अकसर बीयर के गिलास में मूंगफली के दाने डाल देते हैं और वो नाचने लगती हैं. मूंगफली के दाने बीयर से भारी होने के कारण पहले डूब जाते हैं. फिर एक-एक करके दाने ऊपर आने लगते हैं.
मूंगफली के दाने बीयर में क्यों आते हैं ऊपर
परेरा बताते हैं कि मूंगफली एक न्यूक्लिएशन साइट बन जाती है. कार्बन डाइऑक्साइड के छोटे-छोटे सैकड़ों बुलबुले बनते हैं. फिर बुलबुले सतह की ओर बढ़ते हैं. इससे हवा का दबाव कम होता है और मूंगफली के दाने भी बुलबुलों के साथ ऊपर की ओर आ जाते हैं. जर्मनी के म्यूनिख में लुडविग मैक्सिमिलियन यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता परेरा कहते हैं कि ये बुलबुले गिलास की सतह पर बैठने के बजाय मूंगफली के दोनों की सतह पर बनते हैं. जब वे सतह पर पहुंचते हैं, तो फूट जाते हैं. बुलबुला फूटता है, तो दाने फिर नीचे जाने लगते हैं. फिर नया बुलबुला उसे ऊपर ले आता है. इस तरह मूंगफली के दानों का ये डांस तब तक चलता रहता है, जब तक कार्बन डाइऑक्साइड खत्म नहीं हो जाती या कोई बीयर का घूंट लेकर उस प्रक्रिया में रुकावट नहीं डाल देता.

मूंगफली के दाने बीयर में बनने वाले कार्बन डाइऑक्साइड के बुलबुलों के साथ ऊपर की ओर आते हैं.
आकार में कितना बड़ा हो सकता है बुलबुला
साइंस पत्रिका रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस में छपे शोध ‘बीयर गैस पीनट सिस्टम’ में इस प्रक्रिया के दो कारण बताए गए हैं. शोध रिपोर्ट के मुताबिक, बुलबुले और मूंगफली के दाने की सतह के बीच संपर्क का कोण जितना बड़ा होता है, बुलबुले के बनकर बड़ा होने की संभावना ज्यादा होती है. हालांकि, कोई भी बुलबुला बहुत बड़ा नहीं बन सकता है. आदर्श स्थिति में भी ये 1.3 मिमी व्यास से कम रहता है.
उद्योग जगत में कैसे उठा सकते हैं फायदा
परेरा का कहना है कि इस प्रक्रिया को गहराई से समझने का फायदा उद्योग जगत में भी उठाया जा सकता है. वह कहते हैं कि लौह अयस्क से लोहा अलग करने की प्रक्रिया करीब-करीब ऐसी ही होती है. नियंत्रित तरीके से लौह अयस्क के मिश्रण में हवा छोड़ी जाती है. इससे उसकी सतह पर बुलबुले बनते हैं और ऊपर की ओर उठने लगते हैं. इससे मिश्रण में मौजूद लोहा ऊपर उठने लगता है. वहीं, बाकी खनिज सतह की ओर बैठने लगते हैं.
लौह अयस्क से लोहा अलग करने की प्रक्रिया करीब-करीब ऐसी ही होती है.
धरती में मौजूद मैग्मा को समझने में मदद
बीयर में मूंगफली के नाचने की इसी प्रक्रिया की वजह से क्रिस्टल रूप में मैग्मा धरती की सतह के नीचे से जब बुलबुलों के रूप में निकलता है, तो मैग्नेटाइट खनिज साथ लाता है. मूंगफली की तरह मैग्नेटाइट का घनत्व भी ज्यादा होता है. लिहाजा, इसे भी नीचे बैठ जाना चाहिए, लेकिन उसकी सतह पर बड़ा संपर्क कोण बनता है. इसलिए वह बुलबुलों के साथ बाहर आ जाता है.
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FIRST PUBLISHED : June 15, 2023, 21:33 IST






