
नितिन अंतिल/सोनीपत: सोनीपत में एक ऐसी दरगाह मौजूद है, जिसे हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है. मामा-भांजा दरगाह में आज से नहीं, बल्कि सालों से हिंदू परिवार चद्दर चढ़ाते हैं और मुस्लिम समाज के लोग भी यहां सजदा करते हैं. बताया जाता है कि 1992 साल पहले एक राजा यहां पर आए थे, जो घोड़े बेचने के लिए जा रहे थे.
लेकिन उस समय यहां पर किसी और ने उनके घोड़े खरीदने की इच्छा जताई. उन्होंने घोड़े देने से मना कर दिया था, जिसके बाद युद्ध हुआ और वह राजा घायल हो गए. उनका भांजा रोहतक में था तो राजा ने भांजे को बुलाने के लिए कहा. उसका भांजा राजा के पास आ गया. जब युद्ध में दोनों की मौत हो गई तब सोनीपत के गढ़ी ब्राह्मण के रहने वाले एक परिवार को ये दोनों सपने में दिखाई दिए.
कथा के अनुसार, जिस शख्स को सपना आया, वह आंखों से अंधा था. सपने में मामा-भांजा ने मजार बनाने के लिए कहा और उस शख्स से वादा किया कि जैसे ही मजार का काम पूरा होगा, उसकी आंखों की रोशनी लौट आएगी. तभी दोनों की मजारें यहां बनाई गईं. अब यह दरगाह आपसी भाईचारे की मिसाल बन गई. तब से लेकर अब तक सभी धर्मों के लोग यहां आकर मन्नत मांगते हैं.
मामा-भांजा की दरगाह पर पहली चादर गढ़ी ब्राह्मणान गांव की ओर से पेश की जाती है. उसके बाद आल इंडिया सूफी संत की तरफ से चादर चढ़ाई जाती है. इसके बाद मामा-भांजा दरगाह पर आने वाले श्रद्धालु चादर चढ़ाते हैं. मामा-भांजा दरगाह पर हर समुदाय से लोग आकर ज्योत लगाकर प्रसाद चढ़ाते हैं और दरगाह पर माथा टेक कर मन्नत मांगते हैं.
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FIRST PUBLISHED : May 28, 2023, 17:05 IST









