आदर्श पुलिस अधिकारी कैसा हो, इसकी मिसाल थे आरडी झाला!

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आरडी झाला उस शख्स का नाम था, जिसके पुलिस सेवा से रिटायर होने के तीन दशक बाद भी मिसाल दी जाती थी, अगर बात करनी हो समर्पण, कर्तव्यपरायणता और नखशिख ईमानदारी की. एक आदर्श पुलिस अधिकारी कैसा हो, इसकी मिसाल थे आरडी झाला. गुजरात तो ठीक, देश में ऐसे गिने-चुने ही अधिकारी रहे हैं, जिनका नाम बेहिचक इन गुणों की वजह से लिया जा सकता है. गुजरात पुलिस के लिए तो ये एक युग की समाप्ति है.

प्रेरणापुंज थे आरडी झाला!
आरडी झाला का गुजरात पुलिस के लिए क्या महत्व था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब राज्य के नये डीजीपी के तौर पर इस साल मार्च की शुरुआत में विकास सहाय ने कुर्सी संभाली, तो उसके तुरंत बाद वो आरडी झाला का आशीर्वाद लेने के लिए गांधीनगर से राजकोट गये. सहाय ने उस गोधरा में आरडी झाला की अगुआई में काम किया था, जहां से 1994 में अप्रैल के आखिरी दिन रिटायर हुए थे झाला.

दिवंगत आत्मा को गॉर्ड ऑफ ऑनर देती गुजरात पुलिस

पुलिस सब इंस्पेक्टर के तौर पर शुरुआत
झाला कोई डायरेक्ट आईपीएस अधिकारी नहीं थे, बल्कि पुलिस सब इंस्पेक्टर के तौर पर अपने कैरियर की शुरुआत करते हुए आखिरी वर्षों में भारतीय पुलिस सेवा में लिये गये थे और कुछ वर्षों के बाद ही रिटायर हो गये थे. लेकिन रिकॉर्ड और कामकाज ऐसा कि सीधे आईपीएस के तौर पर चयनित होकर डीजीपी की कुर्सी तक पहुंच जाने वाले गुजरात काडर के सैकड़ों आईपीएस अधिकारी अपने आदर्श के तौर पर देखते थे आरडी झाला को.

आरडी झाला से आशीर्वाद प्राप्त करते गुजरात के मौजूदा डीजीपी विकास यादव

रिटायरमेंट के बाद भी नहीं घटी पूछ!
आखिर क्या था ऐसा आरडी झाला में, जिनका जन्म हुआ था भावनगर में और जिसने अपने पुलिस कैरियर की शुरुआत की थी 1958 में, वो भी तब जबकि गुजरात स्वतंत्र राज्य के तौर पर अस्तित्व में भी नहीं आया था. क्यों पुलिस अधिकारी या फिर आम आदमी, सब उनसे प्रभावित थे, वो भी तब जबकि आरडी झाला 1994 में ही रिटायर हो चुके थे. लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी न तो उनकी पूछ घटी थी और न ही उनके पास पहुंचने वाले अधिकारियों की तादाद, वो भी उस राज्य में जहां आधिकारिक वर्ग में ये कहावत काफी प्रचलित है- उतरेलो अमलदार कौडी नो, यानी अगर रिटायर होकर कुर्सी से गये तो भाव शून्य.

आरडी झाला यानी रघुराजसिंह दिलीपसिंह झाला. मूल गांव गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले का मीणापुर, लेकिन जन्म भावनगर में 1 जून 1936 को. ये वो दौर था, जब देश में अंग्रेजी हुकूमत थी, लेकिन बालक रघुराज की परवरिश उस भावनगर रियासत में हुई, जो साढ़े पांच सौ से भी अधिक देशी रजवाड़ों में अग्रणी स्थान रखती थी, शिक्षा और प्रशासन के मामले में, जिसके शासक महाराजा कृष्ण कुमार सिंह गोहिल, वो पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी रियासत का विलय स्वतंत्र भारत में करने का फैसला किया था और आजादी बाद मद्रास प्रांत के पहले भारतीय गवर्नर बने थे 1948 में.

बचपन और स्कूली शिक्षा
झाला के पिता दिलीपसिंह झाला महाराजा भावनगर के एडीसी और रियासत के वन अधिकारी भी थे. इसलिए बचपन से ही एक तरफ जहां आरडी झाला को राजसी ठाटबाट का अहम हिस्सा रहे घोड़ों से प्यार हुआ, वही वन और वन्य प्राणियों से भी. भावनगर से ही स्कूली शिक्षा के साथ शहर के श्यामलदास कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई भी की झाला ने!

2010 में गांधीनगर में एक आयोजन के दौरान आरडी झाला की मुलाकात नरेंद्र मोदी से हुई थी.

झाला ने 1958 में बंबई पुलिस ज्वॉइन की. उन दिनों न तो गुजरात राज्य बना था और न ही महाराष्ट्र. बतौर पीएसआई झाला की ट्रेनिंग हुई नासिक में, जहां पुलिस ट्रेनिंग स्कूल होता था. एक मई 1960 को बंबई को दो हिस्सों में विभाजित कर भाषाई आधार पर दो राज्यों का निर्माण किया गया, महाराष्ट्र और गुजरात. उस दिन से झाला गुजरात पुलिस का हिस्सा बन गये.

कमांडर इन चीफ करियप्पा और सैम बहादुर थे आदर्श
नासिक के बाद ट्रेनी पीएसआई के तौर पर कुछ समय वडोदरा में गुजारने के बाद झाला का सौराष्ट्र के इलाके में आना हुआ, जहां की धरती में वो पले-बढ़े थे. अमरेली के खांभा इलाके में तैनात हुए 1962 में. यही वो साल था, जब भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ. झाला की इच्छा सेना ज्वॉइन करने की हुई, लेकिन गुजरात पुलिस से अनुमति नहीं मिली. मन मसोस कर रह गये, आखिर परिवार में बड़े पिताजी और चचेरे भाई दोनों सेना में जो रहे थे. खुद आरडी झाला के अपने आदर्श थे सैम बहादुर, पहले भारतीय कमांडर इन चीफ करियप्पा और 1961 के गोवा अभियान से नाम कमा चुके सैन्य अधिकारी सगत सिंह.

सेना में नहीं गये आरडी झाला, तो फिर पूरी ताकत लगा दी पुलिस कार्य में. यही से उनको शोहरत मिलने की शुरुआत भी हुई. उस दौर में डकैती की घटनाएं बहुत होती थीं, डकैत लूट मचाकर चले जाते थे, आम आदमी भयभीत और पुलिस परेशान. सौराष्ट्र में तो वैसे भी वहारवटियों की परंपरा थी, बोलकर लूट मचाने की! भूपत की कथाएं तो भारत से लेकर पाकिस्तान तक आज भी प्रचलित हैं, जिससे सौराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री यूएन ढेबर से लेकर देश के पहले पीएम नेहरू की जान तक को खतरा था, सौराष्ट्र में जाने पर. भूपत आखिरी दिनों तक पकड़ा नहीं गया और ज्यादा दबाव बढ़ा तो पाकिस्तान चला गया और फिर वहीं बाकी की जिंदगी बिताई.

आरडी जाला को अंतिम सम्मान देते हुए राजकोट रेंज के आईजी अशोक यादव

झाला ने डाकुओं के खिलाफ झेड़ा अभियान
ऐसे सौराष्ट्र में भूपत कांड के दशक भर बाद झाला ने अपने जौहर दिखाए और कई बड़े डाकुओं को पकड़ा, कुछ को मारा भी. सौराष्ट्र में झाला की शोहरत होनी शुरू हुई, जो कैरियर के आखिरी दिन तक लगातार बढ़ती रही, झाला ने 1962-63 के उस दौर के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा. जांच-पड़ताल में महारत हासिल करने के लिए 1969 में कोलकाता के सेंट्रल डिटेक्शन स्कूल से ट्रेनिंग भी लेकर आ गये. इस दौरान लगातार प्रगति करते चले गये, प्रोन्नति हासिल होती रही.

तेजी से चढ़ीं सफलता की सीढ़ियां
आम तौर पर सब इंस्पेक्टर के तौर पर ज्वॉइन करने वाले अधिकारी डिप्टी एसपी बनते-बनते रिटायर हो जाते हैं. लेकिन झाला अपवाद थे. 1970 में इंस्पेक्टर, 1984 तक डिप्टी एसपी और 1990 आते-आते भारतीय पुलिस सेवा में प्रोन्नति पा चुके थे झाला. इससे पहले 1984 में जब वो भावनगर में तैनात थे डिप्टी एसपी के तौर पर, तो एक महत्वपूर्ण मामले की जांच के लिए वो पंजाब चले गये, अपनी बेटी की मंगनी तक में शामिल नहीं हुए झाला. ड्यूटी को निजी मामलों पर हमेशा वरीयता दी झाला ने.

काम के प्रति समर्पण तो दूसरी तरफ सौ प्रतिशत ईमानदारी. दोनों गुण एक साथ कम ही अधिकारियों में मिलते हैं! लेकिन झाला अनूठे थे. झाला को देखकर पुलिस सेवा में दाखिल होने वाले नये अधिकारी प्रेरणा पाते थे, आखिर एक आदर्श अधिकारी के तौर पर क्या अपेक्षित है, वो झाला से प्रत्य़क्ष सीखते थे.

काठियावाड़ी घोड़ों से था लगाव
पुलिस की सेवा पूरे समर्पण के साथ करते-करते झाला एक और मामले में भी समर्पित रहे. वो था काठियावाड़ी घोड़ों के प्रति उनका समर्पण. गुजरात पुलिस में आज अश्वारोही दल जिस मैनुअल के आधार पर काम करता है, वो खुद झाला ने तैयार किया था 1975 में. गुजरात पुलिस के बेड़े में शामिल होने वाले घोड़ों में काठियावाड़ी घोड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़े, इसकी भी कोशिश की झाला ने. गुजरात पुलिस का अश्वारोही दल विकसित करने में झाला का योगदान कितना बड़ा रहा, इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि रिटायर होने के बावजूद झाला के सम्मान में राजकोट और भावनगर में स्थानीय पुलिस ने अपने राइडिंग क्लब का नाम आरडी झाला के नाम पर ही रखा, जिन दो शहरों में उनके कैरियर का बड़ा समय बीता.

गोधरा के पुलिस अधीक्षक रहे झाला
अपने कैरियर के आखिरी वर्षों में गुजरात के अत्यंत संवेदनशील जिलों में से एक गोधरा के पुलिस अधीक्षक रहे झाला, 25 जुलाई 1991 से लेकर 30 अप्रैल 1994 तक. यहां जनवरी 1991 में एडिशनल एसपी के तौर पर पहले लाया गया था आरडी झाला को और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक मोहन झा के ट्रांसफर के बाद उन्हें एसपी बना दिया गया गोधरा का. गोधरा के अपने कार्यकाल के दौरान झाला ने पूरी सूझबूझ के साथ कानून-व्यवस्था की हालत बेहतर की, जहां सोमनाथ से सितंबर 1990 में शुरू हुई आडवाणी की राम रथ यात्रा के बाद से ही बवाल मचना शुरू हो गया था, और लंबे समय तक कर्फ्यू लगाने की नौबत आई थी.

बाबरी विध्वंस पर गोधरा में कायम रखी शांति!
वर्ष 1992 के दिसंबर में अयोध्या में राम जन्मभूमि पर बनी विवादास्पद बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद भी झाला ने गोधरा के हालात को बिगड़ने नहीं दिया. ये उन तमाम पुलिस अधिकारियों के लिए पहेली थी, जो गोधरा का स्वभाव जानते थे. लेकिन अपनी न्यायप्रियता, सूझबूझ और हिम्मत के साथ सभी समुदायों का विश्वास जीतने में कामयाब रहे थे झाला, जिन्होंने अपनी ट्रेनिंग के दौरान एक ही मंत्र सीखा था, पुलिस अधिकारियों का धर्म ग्रंथ है संविधान और कानून, जो सबके लिए बराबर है. अकेले सड़क पर सैकड़ों उन्मादियों की भीड़ के सामने खड़े हो जाते थे झाला और उनकी मौजूदगी में टोले चुपचाप बिखर जाते थे.

रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी
पुलिस सेवा से रिटायर हो जाने के बाद गुजरात के अमरेली जिले के धारी में रहा करते थे झाला, प्रकृति के बीच. रात में वनराजा शेर उनके फार्महाउस में आ जाया करते थे, जहां झाला ने बिजली का कनेक्शन तक नहीं रखा था, लेकिन वो पूरी तरह बेखौफ रहते थे. उन्हें न तो पुलिस सेवा में रहने के दौरान किसी का खौफ था और न ही नौकरी के बाद, आखिर पूरा जीवन जो ईमानदारी से जीया था, उसी की खुमारी में आखिरी दिन तक रहे झाला. आखिरी दिनों तक शेर की तरह रहने वाले, करारी मूंछें और सधी चाल, ये आरडी झाला की पहचान थी. नफासत और शिष्टाचार में भी उनका कोई मुकाबला नहीं था, अतिथि सत्कार में भी बेजोड़, गरीबों का हमेशा ध्यान रखने वाले.

शेरों के संरक्षण में रहे मददगार
रिटायरमेंट के बाद शहरों की चकाचौंध छोड़कर अमरेली के जंगली इलाके गढ़िया में रहने वाले झाला ने पुलिस की नौकरी के दौरान ही नहीं, रिटायरमेंट के बाद भी शेरों के संरक्षण में काफी मदद की. सत्तर के दशक में जब शिकारियों ने शेरों को अपना शिकार बनाना शुरू किया था, उस वक्त भी उनके गैंग को तोड़ा था. यहां तक कि रिटायरमेंट के काफी बाद, जब 2007 के आसपास एक बार फिर गीर में पोचिंग का खतरा शुरू हुआ, तो इसके लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के आदेश से बनी एसआईटी की भी उन्होंने खूब मदद की थी और शिकारियों के गैंग को पकड़वाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. आखिर झाला को भला कैसे मंजूर हो सकता था कि एशियाई मूल के सिंहों की अंतिम शरणस्थली के तौर पर पूरी दुनिया में मशहूर गीर कैसे शिकारियों का अड्डा बन जाए.

पर्किंसन जैसी बीमारी ने जकड़ा
मिल जंगल विभाग के अधिकारियों से भी वो शेरों के संरक्षण के लिए जरूरी उपाय और शिकारियों के खतरे से कैसे बचा जाए, इसके बारे में हमेशा सलाह देते थे. फिलहाल कच्छ में चीफ कंजर्वेटर ऑफ फोरेस्ट और एक समय जूनागढ़ और गीर सैंक्चुअरी में काम कर चुके वीजे राणा को आज भी याद है कि कैसे आरडी झाला उन्हें बिठाकर टिप्स दिया करते थे. जीवन के आखिरी दिनों तक वो ये काम करते रहे, तब भी जबकि उनको पर्किंसन जैसी बीमारी ने घेर लिया था और चलने- फिरने में भी तकलीफ शुरू हो गई थी. पत्नी जसुबा की साल भर पहले मौत हो जाने और शारीरिक कमजोरी के कारण पिछले छह- आठ महीनों से वो राजकोट रह रहे थे, लेकिन उनसे मिलने वाले लोगों का तांता कम नहीं होता था. इसमें सीनियर- जूनियर पुलिस अधिकारियों से लेकर अश्व प्रेमियों और उनके प्रशंसकों की लंबी-चौड़ी संख्या होती थी.

1983 में ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पति प्रिंस फिलिप के साथ आरडी झाला

घोड़ों के मामले में विशेषज्ञ थे झाला
उनके पास बैठने वाले लोगों को उनके कैरियर के दर्जनों अनूठे किस्से सुनने को मिलते थे, या फिर घोड़ों को लेकर विशद ज्ञान. गुजराती और मारवाड़ी घोड़ों के मामले में विशेषज्ञ थे झाला, जिसके लिए पूरी देश में उनकी पूछ होती थी. यहां तक कि नवंबर 1983 में जब ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पति प्रिंस फिलिप गुजरात के गीर सैंक्चुअरी आये थे और उन्हें वनराज सिंह ने अपने दर्शन नहीं दिये थे, तो झाला ने ही अश्व प्रदर्शन कर उनका मन बहलाया था और अपनी जानकारी का लोहा मनवाया था. ध्यान रहे कि प्रिंस फिलिप खुद वन्य प्राणियों के बारे में अच्छी खासी जानकारी रखते थे, वे वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड यूके के अध्यक्ष रह चुके थे. लेकिन जब चांद नामक घोड़े के बारे में उनकी टिप्पणी सही नहीं थी, तो झाला ने अपने शाही मेहमान की गलती सुधारने में कोई हिचक नहीं महसूस की.

नरेंद्र मोदी और आरडी झाला की मुलाकात
घोड़ों और घुड़सवारी के अलग-अलग खेलों में उनकी पकड़ इतनी अधिक थी कि न सिर्फ युवा प्रतिभाओं को वो निखारने का काम बड़े पैमाने पर करते थे, बल्कि गुजरात ही नहीं, गुजरात के बाहर आयोजित होने वाली अश्वारोही प्रतियोगिताओं में रेफरी के तौर पर जाते थे. ऐसे ही एक मुकाबले के 2010 में गांधीनगर में आयोजन के दौरान उनकी मुलाकात नरेंद्र मोदी से भी हुई थी, जिन्होंने झाला की बतौर पुलिस अधिकारी प्रामाणिकता और घुड़सवारी में उनके योगदान की काफी तारीफ की थी.

नेहरू की सुरक्षा से पुलिस बंदोबस्त हटाने का किस्सा
पीएसआई से एसपी के तौर पर अपने सफर में खूब शोहरत बटोरने वाले झाला ने जब कैरियर शुरू किया था, तो आईपी अधिकारियों का जमाना था, जो आईसीएस अधिकारियों की तरह ही पुलिस सेवा के लाट थे, आज के आईपीएस अधिकारियों की तुलना में काफी रसूख और ठसक वाली प्रजाति. झाला आखिरी वर्षों तक ये किस्सा बड़े चाव से बताया करते थे कि कैसे अहमदाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एन रामा अय्यर ने, जो खुद आईपी अधिकारी थे, 1961-63 की अवधि में, जब शहर में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की एक सभा चल रही थी, वहां से पुलिस बंदोबस्त हटा दिया था. कारण ये था कि उनके एक जूनियर अधिकारी को, जो कि मंच पर चढ़ रहे एक अनजाने व्यक्ति को रोक रहा था, तो नेहरू ने दो बार झिड़क कर भगा दिया था, अपना काम करने से रोक दिया था.

भन्नाये रामा अय्यर ने बिना इस बात की चिंता किये कि अंजाम क्या होगा, विभागीय कार्रवाई भी हो सकती है, पुलिस जवानों और अधिकारियों को नेहरू की सभा से हटा लिया कि अगर पुलिस अधिकारियों के जरूरी निर्देश की परवाह नहीं करते पीएम, तो फिर उन्हें सुरक्षा देने की क्या जरूरत है भला. आज कोई इस पर यकीन भी नहीं कर सकता. लेकिन झाला ने ये सब अपने कैरियर के शुरुआती वर्षों में देखा था, और कानून- व्यवस्था के मामले में बिना किसी का लाज-लिहाज किये जरूरी कदम उठाए थे. झाला अपने साथ ऐसे तमाम अनूठे किस्सों की पोटली लेकर चले गये, अब है तो उनकी यादें, जिससे प्रेरणा पाती रहेगी न सिर्फ गुजरात पुलिस, बल्कि देश भर के अधिकारी, जो समाज के सामने खुद को आदर्श के तौर पर पेश करने का ख्वाब रखते हैं.

लेखक नेटवर्क18 समूह में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से 1995-96 में पत्रकारिता की ट्रेनिंग, बाद में मास कम्युनिकेशन में पीएचडी. अमर उजाला समूह, आजतक, स्टार न्यूज़, एबीपी न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ में काम करने के बाद अप्रैल 2019 से नेटवर्क18 के साथ. इतिहास और राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले पत्रकार, समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन, दो दशक तक देश-विदेश में रिपोर्टिंग का अनुभव.

Tags: Gujarat, Narendra modi

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Author: Up Head Line

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