
हाल ही में हिंदी पॉकेट बुक्स से एक शानदार पुस्तक छपकर आई है ‘श्री सिद्धि मां’. इसकी लेखिका है जया प्रसाद. सिद्धि मां नीम करोली बाबा की अनन्य भक्त थीं. जया प्रसाद उनकी सेवा-भक्ति भाव से प्रभावित होकर उनकी शिष्या बन गईं. सिद्धि मां के सानिध्य में रहकर जया प्रसाद ने ना केवल नीम करोली बाबा को नजदीक से जाना, बल्कि उनसे जुड़ी तमाम चमत्कारिक कहानियों की खुद साक्षी भी बनीं.
सिद्धि मां के साथ रहते हुए जया प्रसाद ने देशभर में फैले नीम करोली बाबा के तमाम आश्रम का भ्रमण किया. इन आश्रमों के साथ-साथ वह भारत के अधिकांश तीर्थ स्थलों पर भी गईं. इन तमाम अनुभवों को उन्होंने शब्दों में पिरोकर एक पुस्तक का आकार दिया है. अनेक अध्यायों में यह पुस्तक नीम करोली बाबा को नजदीक से जानने का अवसर देती है.
1973 में नीम करोली महाराज की महासमाधि के बाद सिद्धि मां ही उनकी दैवीय संपदा की संरक्षक बनी थीं. सिद्धि मां के साथ एक और सहयोगी थीं जीवंती मां. नीम करोली बाबा ने जीवंती मां को सिद्धि मां के कवच के रूप में चुना था.
कहानी यहां से शुरू होती है- वह साठ के दशक के आरंभ की बात थी, उन दिनों लेखिका अपनी मां के साथ अक्सर कैंची धाम जाया करती थीं. कैंची नैनीताल से 20 किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव है और यहीं पर नीम करोली महाराज का आश्रम है. पुराने दिनों को याद करते हुए वह लिखती हैं- “वहां पहुंचकर जैसे ही हम क्षिप्रा नदी पर बने लकड़ी के पुल को पार करते, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ संकीर्तन की मधुर ध्वनि हमारे कानों में गूंजने लगती. नीम करोली महाराज विंध्यवासिनी मंदिर के पास बने बरामदे में अपने तखत पर बैठे, भक्तों की भीड़ से घिरे रहते थे. भक्तों के इस समूह में अनेक विदेशी, उच्च पदस्थ अधिकारी, राजनेता और स्थानीय महिलाएं होती थीं.”
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नीम करोली महाराज का पहनावा एक सफेद धोती और कंबल हुआ करता था. साधु-सन्यासियों द्वारा धारण किए जाने वाले चिह्न, जो उन्हें एक संत के रूप दर्शाते, उन्होंने कभी धारण नहीं किए.
कई बार महाराजजी (नीम करोली बाबा) अपने सहज स्वरूप में तखत पर लेटे रहते थे. लोग उनके पास जाते और उन्हीं से पूछते कि नीम करोली बाबा के दर्शन कहां हो सकते हैं. तब वे बड़ी सरलता से कहते, “मैं किसी बाबा को नहीं जानता. हनुमानजी के मंदिर में जाकर उनसे प्रार्थना करो”.
बाबा एक, नाम अनेक
लोगों का विश्वास है कि नीम करोली बाबा पवन पुत्र हनुमानजी के अवतार थे. बाबा के जीवन के बारे में अलग-अलग कहानियां हैं. उनके एक अमरिकी भक्त डॉ. रिचर्ड अल्पर्ट अपनी पुस्तक मिरेकल ऑफ लव में लिखते हैं- “महाराजजी की कोई जीवनी हो ही नहीं सकती क्योंकि तथ्य बहुत कम, कहानियां अनेक हैं.”
वर्ष 1900 के प्रारम्भ में बाबा नीम करोली का जन्म उत्तर प्रदेश के गांव अकबरपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनका नाम लक्ष्मी नारायण था. केवल ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया और भारत के अलग-अलग हिस्सों का भ्रमण करने लगे. इसी दौरान उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाने लगा. गुजरात के बवानिया ग्राम में एक तालाब के निकट साधना करने के कारण उन्हें ‘तलैया वाले बाबा’ के नाम से जानते थे. कुछ स्थानों पर लोग उन्हें ‘तिकोनिया वाले बाबा’ तथा ‘हांडी वाले बाबा’ के नाम से भी जानते हैं.
पुस्तक से पता चलता है कि नीम करोली वाले बाबा गृहस्थ जीवन में भी लौटे परंतु कुछ समय बाद ही गृहस्थ जीवन त्यागकर चले गए. बाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में वे ‘लछमन दास बाबा’ के नाम से पुकारे जाते थे. आखिर में उन्होंने नीम करोली गांव में प्रवास किया और यहीं से नीम करोली बाबा के नाम से विख्यात हुए.
दूसरे अध्याय में अल्मोड़ा के संतों के बारे में विस्तार से बताया गया है. सदियों से अल्मोड़ा साधु-महात्माओं और संतों के आकर्षण का केंद्र रहा है. बीसवीं शताब्दी से यहां कौन-कौन से संत आए, बहुत से विदेशी महिला-पुरुष भी यहां आकर संन्यासी हो गए और अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध हुए. इस अध्याय में सिद्धि मां के जन्म से लेकर उनके विवाह तथा नीम करोली बाबा के सत्संग में रहने का वर्णन पढ़ने को मिलता है.
बाबा की अनन्य भक्त सिद्धि मां
सिद्धि मां के बारे में लेखिका लिखती हैं- वर्ष 1930 के मध्य की बात होगी. अल्मोड़ा के बाजार में चहल-पहल हो रही थी. तभी वहां के स्थानीय लोगों ने सहसा धोती पहने और कम्बल ओढ़े एक लंबी-चौड़ी काया के व्यक्ति को नगर के व्यापारी प्यारे लाल साह की दुकान पर देखा. इस आगमन के महत्व का किसी को भान तक नहीं था. ये अभ्यागत स्वयं नीम करोली बाबा थे जो साह की सात वर्षीय कन्या सिद्धि को आशीर्वाद देने आए थे. यही नन्हीं बालिका सिद्धि कालान्तर में बाबा की परम भक्त और शिष्य बनी.
सिद्धि मां का जन्म 1928 की चैत्र नवरात्रि की दशमी तिथि को अल्मोड़ा के साह परिवार में हुआ था. उनका नाम हरिप्रिया रखा गया. लेकिन पिता उन्हें प्यार से सिद्धि नाम से पुकारते थे. 1944 में 16 वर्ष की आयु में सिद्धि का विवाह नैनीताल के प्रसिद्ध वकील तुलाराम साह के साथ सम्पन्न हुआ.
यह परिवार भी नीम करोली बाबा का भक्त था और बाबा यहां समय-समय पर सत्संग के लिए पधारा करते थे. समय बीतने के साथ सिद्धि मां और उनका पूरा परिवार बाबा के साथ भारत के विभिन्न मंदिरों और तीर्थ स्थलों की यात्रा पर जाने लगा. 1962 में तुलाराम जी का देहांत हो गया. इस घटना के बाद नीम करोली बाबा ने जीवंती मां को गीता भवन में सिद्धि मां के साथ ही रहने का आदेश दिया. इसके एक वर्ष के बाद सिद्धि मां अपने गृहस्थ जीवन को सदा के लिए त्यागकर जीवंती मां के साथ कैंची आश्रम आ गईं.
कैंची गांव का धाम बनने की कथा
पुस्तक में कैंची गांव का कैंची धाम बनने का बड़ा सुंदर वर्णन है. पुस्तक में लिखा है- साठ के दशक के प्रारंभ की बात है. सिद्धि मां बाबा के साथ शीतलाखेत जा रही थीं. रानीखेत पहुंचने पर टेलीफोन से समाचार मिला कि सिद्धि मां के परिवार में किसी निकट संबंधी का देहांत हो गया है. यह सुनकर महाराज ने सिद्धि मां को नैनीताल वापस लौट जाने का आदेश दिया. वापस लौटते हुए रास्ते में नदी के किनारे एक घने जंगल के पास गाड़ी रुकवाकर महाराज स्वयं उतर गए. सिद्धि मां ने महाराज का हाथ पकड़कर उन्हें नदी पार कराई. नदी के पास जंगल में एक पेड़ के नीचे एक बड़ी पाषाण शिला थी. महाराज उस पर बैठ गए और सिद्धि मां से कहा कि उनके लौटने पर वह उन्हें यहीं मिलेंगे. वहां से वापस आते हुए सिद्धि मां ने एक स्थानीय निवासी से उस जगह का नाम पूछा तो उसने उत्तर दिया- कैंची. यहीं सिद्धि मां का कैंची से पहला परिचय हुआ जो बाद में उनके जीवन की कर्मभूमि बना. जिस चट्टान पर महाराजजी उस दिन बैठे थे उसे कैंची धाम में अब महाराजजी की शिला के नाम से जाना जाता है.
पुस्तक के तीसरे अध्याय में जीवंती मां के जन्म से लेकर उनके बाबा की शिष्य होने और फिर सिद्धि मां की सहयोगी बनने की कहानी है.
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कैंची धाम की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, आश्रम में भक्तों का समर्पण और त्याग की कई कहानियां पढ़ने को मिलती हैं. यहीं से पता चलता है कि लेखिका का सिद्धि मां से किस प्रकार संपर्क होता है और वह न चाहते हुए भी कैसे उनके दिव्य व्यक्तित्व से प्रभावित होती चली गईं.
एक अन्य अध्याय में बाबा नीम करोली के महासमाधि में लीन होने का वर्णन मिलता है. 9 सितंबर, 1973 की पूर्वान्ह का समय था. महाराजजी के पास जीवंती माता और कुछ भक्त बैठे थे, महाराजजी लेटकर अपनी हाथ की कोहनी का सहारा लेते हुए एक नोटबुक में ‘राम-राम’ नाम लिख रहे थे. नौ तारीख ऊपर डालकर महाराज ने पूरे पन्ने में राम नाम लिखा. इसी प्रकार 10 तारीख डालकर एक और पन्ना भरा. फिर अगले पृष्ठ पर केवल 11 सितंबर की तिथि डाली और उसे खाली छोड़ दिया. नोटबुक को माता की ओर बढ़ाकर बोले- ‘अम्मा आज से तू ही इसमें लिखेगी’. दो दिन बाद 11 सितंबर को महाराजजी ने महासमाधि ले ली.
पुस्तक के माध्यम से हम नीम करोली बाबा, कैंची धाम, सिद्धि मां, जीवंती मां से तो परिचित होते ही हैं साथ ही आश्रम में रहने वाले अनेक गुमनाम लोगों के जीवन में भी झांकने का मौका मिलता है जो लंबे समय से यहां सेवाकार्य में लगे हुए हैं. आश्रम की गतिविधियों को जानने का मौका मिलता है.
सबसे महत्वपूर्ण पर्व 15 जून
कैंची धाम में हर वर्ष मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण पर्व 15 जून का भंडारा होता है. महाराजजी द्वारा कैंची के मंदिरों की स्थापना के लिए 15 जून की तिथि निर्धारित की थी. वर्ष 1976 में महाराजजी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए सिद्धि मां ने भी 15 का दिन नियत किया था. 15 जून के भंडारे के एक महीने पहले से महाराजजी के मंदिर में अखंड हनुमान चालीसा का पाठ प्रारम्भ हो जाता है जो 14 जून तक अनवरत जारी रहता है. इसके तुरंत बाद यज्ञशाला में रामचरितमानस का पाठ आरम्भ हो जाता है जिसका पारायण 15 जून को हवन यज्ञ से होता है. भंडारे के लिए मालपुए पारम्परिक विधि से तैयार किए जाते हैं. इस प्रकार इस दो अध्यायों (9 और 10 अध्याय) में हम कैंची धाम में होने वाले विशाल भंडारे, उसके इंतजाम के बारे में जान पाते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि लेखिका ने पुस्तक में हर छोटे-बड़े उस व्यक्ति का उल्लेख किया है जो आश्रम में सेवा कर रहा है. मसलन, भंडारे के लिए मालपुए बनाने वाले कारिगर शांति का भी जिक्र यहां किया गया है.
प्रसाद ग्रहण करने के बाद शुरू होती है यात्रा लेखिका और सिद्धि मां के और नजदीक आने तथा दोनों के तीर्थ यात्राओं पर जाने की. इन तीर्थ यात्राओं के माध्यम से पाठक पूर्णागिरी की पवित्र यात्रा की करते हैं.
लेखिका ने बड़े ही सुंदर ढंग से यात्राओं के प्रत्येक पढ़ाव का वर्णन किया है. पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक इन इलाकों की यात्रा भी करता है. चकराता की यात्रा में आप बुरांश के पेड़ से होते हुए यमुना नदी को पार करते हैं. कैंची धाम के साथ-साथ बाबा नीम करोली के देश के अलग-अलग हिस्सों में बने आश्रमों के भी दर्शन करने का मौका इस पुस्तक में मिलता है. यहां आप ऋषिकेश की यात्रा करते हैं. बद्रीनाथ के दर्शन के लिए जाते हैं. बद्रीनाथ के दर्शन के पश्चात वसुधारा का भ्रमण कर सकते हैं. यहां भ्रमण करते हुए आप प्रकृति का अनुपम दृश्य देखते हैं और आपको ठंडी हवा के झोंके तथा बर्फ पर चलने का अहसास होता है.
पुस्तक के पन्ने पटलते हुए पाठक बर्फ से ढकी चोटियों की यात्रा करता हुए आप इलाहबाद कुंभ में पहुंच जाता है. कुंभ के मेले का ऐसा सजीव वर्णन किया गया है मानो गंगा स्नान के लिए भक्तों की भीड़ आपकी आंखों के सामने से ही गुजर रही हो.
बीसवें अध्याय में लेखिका पाठकों को वृंदावन की सैर पर ले चलती हैं. काठगोदाम से ट्रेन में सवार होकर लेखिका सिद्धि मां के साथ वृंदावन धाम की यात्रा पर निलकती हैं. खासबात ये है कि यह यात्रा स्टीम इंजन यानी भाप वाले इंजन की ट्रेन से होती है, क्योंकि यह यात्रा अस्सी के दशक की है. तब कोयले वाले इंजन ही चला करते थे. स्टीम इंजन वाली ट्रेन का यात्रा का पहला पड़ाव कासगंज स्टेशन पर होता है. यहां आप चाय की चुस्कियों का आनंद लेते हैं.
बता दें कि वृंदावन में भी नीम करोली बाबा का एक बड़ा आश्रम है. बाबा ने 1973 में अनंत चतुर्दशी के दिन वृंदावन की पवित्र भूमि में ही महाप्रयाण किया था. जिस स्थान पर महाराजजी का अंतिम संस्कार किया गया था वहां पर भव्य समाधि मंदिर बना हुआ है. भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है. इस दिन प्रत्येक वर्ष यहां बड़ा आयोजन होता है. देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं. ब्रजधाम में गिरिराज गोवर्धन की सात कोसी परिक्रमा करें. बरसाने में लाडली जी के दर्शन से धन्य हो जाएं, नंदगांव की सीढ़ियां चढ़ते हुए आलौलिक अनुभव करें. निधि वन, सेवा कुंज, कुंज गलियों में होते हुए कान्हा के संग अबीर-गुलाल से होली खेलें.
कहां है नीम करोली
अध्याय इक्कीस में नीम करोली के बारे में विस्तार से बताया गया है. नीम करोली उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जनपद का एक छोटा-सा गांव है. महाराजजी जब नीम करोली बाबा के नाम से विख्यात हुए तो इस गांव को अलग पहचान मिली. बताते हैं कि इस गांव में बाबाजी ने लंबे समय तक प्रवास किया. पुस्तक में बताया गया है कि यह बात तब की है जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था. यह कहानी प्रचलित है कि एक बार बाबाजी रेलगाड़ी द्वारा कहीं की यात्रा कर रहे थे तो ट्रेन के परिचालक ने उन्हें गाड़ी से उतार दिया. महाराजजी जैसे ही ट्रेन से उतरे, ट्रेन वहीं रुक गई. काफी मशक्कत के बाद भी गाड़ी वहां से नहीं चली. तमाम कोशिशें करने बाद भी जब ट्रेन नहीं चली तो रेल कर्मचारियों को अपनी गलती का भान हुआ. उन्होंने प्रार्थना करने के बाद महाराजजी को ट्रेन में चढ़ाया और ट्रेन चल पड़ी. ऐसी अनेक घटनाओं ने लोगों को बाबा लछमन दास की झोपड़ी मठिया में जाने के लिए प्रेरित किया. बाद में यही बाबा लछमन दास ‘नीम करोली बाबा’ कहलाए.
चेन्नई में आश्रम
नीम करोली बाबा का एक आश्रम चेन्नई से 32 किलोमीटर दूर वीरापुरम गांव में भी है. यहां दंडायुत्पानी स्वामी, नागकन्या मंदिर और नवग्रह मंदिर भी हैं. वीरापुरम रहते हुए सिद्धि मां दक्षिण भारत के तमाम तीर्थस्थलों जैसे रामेश्वरम आदि की यात्रा करती हैं. तेईसवें अध्याय में ओडिसा की यात्रा पर निकलते हैं. यहां जगन्नाथ जी के दर्शन करते हुए कोलकाता में कालीदेवी के दर्शन करते हैं.
कुल सत्ताइस अध्यायों की इस पुस्तक में देश के तमाम तीर्थस्थलों की यात्रा करते हुए हम पहुंचते हुए अंतिम पड़ाव की ओर. अंतिम पड़ाव पुस्तक का भी और जीवन का भी. 28 दिसंबर, 2017 को ब्रह्म मुहूर्त में सिद्धि मां महासमाधि लेकर मोक्ष गति को प्राप्त हुईं. इस तरह हम इस पुस्तक के माध्यम से नीम करोली बाबा, उनके आश्रम तथा उनके भक्तों के बारे में तमाम जानकारियों से रू-ब-रू होते हैं.
पुस्तक- श्री सिद्धि मां
लेखक- जया प्रसाद
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स (पेंगुइन रैंडम हाउस)
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Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature, Nainital news
FIRST PUBLISHED : April 24, 2023, 17:04 IST






