दो हफ़्ते हो गये. ना लिखा, ना पढ़ा, ना सोचा. सिर्फ़ देखा, सीखा और अनुभव किया. कभी कभी ऐसा होता है कि जीवन में चुप रहने की ज़रूरत महसूस होती है. नहीं मन करता कि बात करें. नहीं मन करता किसी से मिलें. शून्य हो जाने को मन करता है. मैं और मेरी तन्हाई में, मन फिर से “ख़ाली स्लेट” होना चाहता है. शारीरिक और मानसिक रीबूट बटन दबाने की घनी इच्छा जागृत होती है. ऐसा ही कुछ बावरे मन को भी महसूस हुआ और वो शांत हो गया…पूरे दो हफ़्ते के लिए.
दरअसल पच्चास की उम्र में मन स्वाभाविक तौर से अध्यात्म की तरफ़ रुख़ करने की “सोचने” लगता है. बावरे मन को भी लगा कि अब अध्यात्म की तरफ़ कदम बढ़ाये जायें. सो पहले तो कई आध्यात्मिक गंतव्य स्थानों पर विचार हुआ. फिर ना जाने कैसे मन हरिद्वार, कोयंबतूर करते करते, अन्ततः पालघर महाराष्ट्र पर जा अटका. वैसे हर बात के पीछे कोई ना कोई संयोग होता है और ये बस संयोग ही था कि इस बार मन सईहाद्री की पहाड़ियों की तलहटी में बसे इस सुदूर आदिवासी इलाक़े में जा अटक गया था.
एक तो जगह इतनी सुंदर ऊपर से यहाँ इस्कॉन वालों ने एक अनूठे ईको विलेज की स्थापना की है. एक आत्मनिर्भर गाँव का सुंदर उदाहरण तैयार किया है. उनके इस अनोखे गाँव में सारी व्यवस्थाएँ हैं. ये एक आदर्श आत्मनिर्भर समाज का छोटा स्वरूप है, जिसमें अपनी खेती है, अपनी गोशाला है, अपनी ही छोटी सी अर्थव्यवस्था है, अपना स्कूल है और अपना ही स्किल डेवलपमेंट सेंटर है. यानी, कृष्ण भक्ति और समाज कल्याण का एक अद्भुत मॉडल है पालघर का गोवर्धन ईको विलेज. पिछले दो हफ़्ते का बावरे मन के “इनर इंजीनियरिंग” का प्रवास स्थान… जी हाँ आजकल इस मनःस्थित/प्रक्रिया को इनर इंजीनियरिंग का ही नाम दिया जाता है.
महाराष्ट्र की सईहाद्री पहाड़ियों में स्थित गोवर्धन इको विलेज पर्यटकों के आकर्षण का नया केंद्र है. फोटोः News18
सईहाद्री का मथुरा वृंदावन
गोवर्धन ईको विलेज की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है. इसका मथुरा वृन्दावन हो जाना. सुनने में अटपटा लग सकता है कि जब ओरिजिनल तीर्थस्थल है तो उसे रिप्लीकेट करने कि क्या ज़रूरत है. लेकिन ये तो यहाँ आने वालों और इस जगह पर श्रद्धा रखने वालों की तादाद बताती है कि लोग इस जगह से कितना प्रेम करते हैं. हर रोज़ हज़ारों की तादाद में लोग इस सुदूर तालुके में आ भगवान कृष्ण को अपने पास पाते हैं. यहाँ का श्री श्री राधा वृंदावन बिहारी मंदिर, मदन मोहन मंदिर श्रद्धालुओं में ख़ासा लोकप्रिय है. सुबह से शाम यहाँ भीड़ ही भीड़ नज़र आती है. अंदर का रिट्रीट सबके लिये नहीं है. वहाँ सिर्फ़ प्रवास करने वाले, ही प्रवेश पा सकते हैं. सुबह का यज्ञ, शाम को यमुना किनारे की आरती, कहीं प्रवचन तो कहीं वर्कशॉप यानी प्रभु की तलाश के साथ अपने अंदर कि खोज में लगे इंसान के लिये ये जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है. इसीलिए इसे रिट्रीट का नाम दिया गया है. इस रिट्रीट में पुरुषों को “प्रभु जी”, महिलाओं, लड़कियों को “माता जी” कह कर संबोधित किया जाता है. हेलो हाय के लिए “हरी बोल” है और हर आते जाते को “हरे कृष्णा” कह अभिनंदन किया जाता है.
प्रकृति की गोद, भगवान का साथ और अध्यात्म की तरफ़ बढ़ते कदम… बावरा मन अब ज़रा स्थिर हो रहा था.
गोवर्धन इको विलेज स्थित गोशाला से पूरे गाँव, उसके मेहमानों की दूध की ज़रूरत पूरी हो जाती है. फोटोः News18
सौ एकड़
सौ एकड़ में बसे इस अद्भुत गाँव में पैदल चलने पर ज़ोर दिया जाता है. अंदर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और साइकिल्स की ही अनुमति है. यहाँ की कैंटीन में और रिट्रीट के अंदर स्थित गोविन्दा रेस्ट्रांट में लहसुन प्याज़ रहित सात्विक भोजन ही सर्व होता है. आत्मनिर्भरता पर ज़ोर है इसलिए अधिकतर खाने पीने की चीज़ें कैंपस में ही उगायी जाती हैं. गोशाला से पूरे गाँव, उसके मेहमानों की दूध की ज़रूरत पूरी हो जाती है. यहाँ प्रवास करने आये लोगों में यहाँ का आयुर्वेद सेंटर भी आकर्षण का केंद्र है. इस आयुर्वेद सेंटर की अपनी धन्वंतरि कैंटीन में आयुर्वेदिक रेसिपी के अनुसार ख़ाना बनाया जाता है. देख कर अच्छा लगा कि तमाम विदेशी कृष्ण भक्तों में आयुर्वेदिक खाने का बड़ा आकर्षण था. इसी कैंटीन में फ़िलेडेल्फ़िया से आयी युवती मैकेंज़ी से मुलाक़ात और दोस्ती हुई. मैकेंज़ी कई महीनों से यहाँ “गोकुल” में रह रही हैं. गीता पर अध्ययन कर रही हैं.
दुनिया भर से लोग इस जगह शांति की तलाश में आते हैं. कृष्ण मय हो, धोती कुर्ता, लहंगा चोली अपना लेते हैं.
भक्ति, आधुनिक प्रबंधन, लोक कल्याण की मिश्रित सोच का अद्भुत परिणाम है, गोवर्धन ईको विलेज. फोटोः News18
सामाजिक योगदान
गोवर्धन ईको विलेज महाराष्ट्र के जिस ज़िले पालघर में स्थित है, उसे पिछड़ा हुआ इलाक़ा माना जाता रहा है. ये एक ट्राइबल इलाक़ा है. लेकिन इस रिट्रीट की स्थापना के बाद यहाँ की ट्रस्ट ने इस पूरे इलाक़े में बहुत काम किया है. शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, वाटर हार्वेस्टिंग, आर्गेनिक खेती, हर क्षेत्र में यहाँ की संस्था ट्रेनिंग, हैंड होल्डिंग से लेकर अवसर प्रदान करवाने तक का काम कर रही है. उनके इस प्रयास में और भी अनेक संस्थाएँ, संस्थान और उद्योगपति साथ आये हैं. गोवर्धन ईको विलेज द्वारा पालघर में एक स्टेट ऑफ़ द आर्ट “स्किल डेवलपमेंट सेंटर” चलाया जा रहा है. यहाँ से विभिन्न विधाओं में प्रशिक्षण प्राप्त कर स्थानीय युवाओं ने अपने लिए रोज़गार के नए अवसर चुन लिए हैं. इस तरह भक्ति, आधुनिक प्रबंधन, लोक कल्याण की मिश्रित सोच का अद्भुत परिणाम है, गोवर्धन ईको विलेज, इस्कॉन मंदिर, पालघर, महाराष्ट्र.
चलते चलते
लीजिए जनाब!! बावरा मन अपनी तरफ़ से होने चला था सफ़ाचट. क्लीन स्लेट. लेकिन पालघर जा, इतना सामाजिक अच्छा कार्य देख नयी ऊर्जा के साथ, स्लेट पर नये काम लिखवा कर वापिस लौट आया है. उसने जान लिया है कि अभी अध्यात्म की उम्र नहीं हुई है. अभी उसके लिए कर्म ही अध्यात्म है, कर्म की राह ही उसका धर्म है. इसलिए बहुत से कार्य अपने हिस्से में बांध कर फिर वापसी हुई है. आपसे मुलाक़ात भी अब होती ही रहेगी. मिलते हैं…
हरी बोल????????






