
कासिम खान/नूंह. नूंह के शाह चौखा गांव में स्थित दादा शाह चौखा की दरगाह अपने आप में ही अनूठा इतिहास समेटे हुए है. यहां दूर- दराज से लोग मन्नत मांगने आते हैं. यहां तक की चुनावों के समय में सूबे के दिग्गज नेता भी मुराद मांगने पहुंचते हैं. करीब 500 साल पुरानी ये दरगाह शाह चौखा गांव में है, जो पहले खोरी के नाम से जाना जाता था. मजार सैकड़ों फिट ऊंचाई पर बना हुआ है. इलाके में हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्मों के लोग यहां मुराद मांगने और चादर चढ़ाने आते हैं.
कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर ने भी यहां मन्नत मांगी थी और उनकी मुराद पूरी भी हुई थी. परिवार में बेटे की किलकारी गूंजी थी, तभी से दादा शाह चौखा की दरगाह की मान्यता और भी ज्यादा बढ़ गई.
ऐसे रखा गया दरगाह का नाम
गांव वाले बताते हैं कि जब दादा शाह चौखा पहाड़ पर बैठे थे, तो कुछ लोग उनसे पूछने लगे कि आप कौन हो , कहां से आए हो. बातचीत में ग्रामीण दादा शाह चौखा से संतुष्ट हुए और उन्होंने अन्य गांव वालों को बताया कि चोखों आदमी है यानि बढ़िया व्यक्ति है, उसी दिन बाबा का नाम चौखा पड़ गया. उनकी याद में यह आलिशान मजार बनाई गई. मान्यता तो यह भी है कि यह मजार एक ही रात में बनाई गई. दादा चौखा के पैर का निशान पत्थर पर है. उसी से लगता है कि दादा शाह चौखा विशाल कद – काठी के व्यक्ति थे. उनके 11 पुत्र थे , जिन्होंने गांव शाह चौखा बसाया था. बुजुर्ग बताते हैं कि सऊदी अरब से दादा शाह चौखा दिल्ली आये थे और बाद में वे अमन-शांति का पैगाम लेकर खोरी चौखा गांव में आए थे. मजार में विशाल दरवाजे हैं , जिनको सरसों का तेल लगाकर आज भी सुरक्षित रखा गया है.
हादसे के बाद बंद हो गया मदरसा
मजार पर इस्लामिक मदरसा चलता था, लेकिन एक हादसा होने की वजह से मदरसे में बच्चे शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं। मजार में कब्र के पास हमेशा से सरसों के तेल का दिया ही जलाया जाता है. रौशनी से इस मजार को दूर रखा गया है. गांव के लोग अपने बुजुर्ग की मजार की देखरेख में कमी- कोताही नहीं करते. शुरुआत में पहाड़ के ऊपर यह मजार बनी थी , उस समय मजार पर जाने के लिए रास्ते की अच्छी व्यवस्था नहीं थी , लेकिन कुछ साल पहले तत्कालीन सरकार के सहयोग से रास्ता मजार तक बना दिया गया. ताकि लोगों को दीदार करने के समय ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़े. मजार पर आरामगाह बनी हुई है.
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Tags: Dharma Aastha
FIRST PUBLISHED : May 27, 2023, 15:52 IST









