हाइलाइट्स
इजराइल के देश के रूप में दर्जा देने का वादा प्रथम विश्व युद्ध से पहले किया गया था.
द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका झेलने के बाद यहूदियों के इजराइल के रूप में देश मिला.
आजाद मुल्क बनने के बाद से ही वह विरोधियों के हमलों का मुकाबला करता आ रहा है.
आज इजराइल पिछले दो दिन से फिलिस्तीनी आतंकियों ने इजराइल के पश्चिमी तट पर रॉकेट लॉन्च करब बड़ा हमला बोला है. लेकिन 14 मई को इजराइल अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. आज एक बार फिर इजराइल अपने पड़ोस से युद्ध लड़ने की स्थिति में है. यह दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो यहूदियों का है और पिछले 75 सालों से ना केवल हर तरफ से अपने दुश्मनों से घिरा है बल्कि कभी ना कभी किसी ना किसी से युद्ध जैसे हालात में सर ऊंचा रखते हुए अपने अस्तित्व को कायम रखे हुए है जो एक बार फिर युद्ध के हालात में जाता दिख रहा है. आइए जानते हैं इजराइल ने इतने सालों में कैसे खुद को अपने दुश्मनों के बीच जिंदा रखा.
आजादी के अगले दिन ही युद्ध का सामना
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने येरुशलम के पास की जमीन को फिलिस्तीन और इजराइल के बीच बांटकर येरूशलम को अंतरराष्ट्रीय शहर घोषित कर दिया. इस प्रस्तावित बंटवारे को इजराइल ने स्वीकार कर लिया पर फिलिस्तीनी मुस्लिम इससे संतुष्ट नहीं थे. इसका नतीजा यह हुआ कि इजराइल की आजादी के एक दिन बाद 15 मई, 1948 अरब सेनाओं ने हमला कर दिया. इसमें सीरिया, ट्रांस जॉर्डन, सीरिया और ईराक जैसे अरब देशों की संयुक्त सेना शामिल थी.
क्या किया अरब सेना ने
इस हमले के बाद अरबों की सेना ने, जो इलाका फिलिस्तीन अरब देश के रूप में संयुक्त राष्ट्र ने पहचाना था, उसे अपने कब्जे में ले लिया. इसके साथ ही अरब सेना यहीं तक नहीं रुकी, इस सेना ने इजराइल के कब्जे वाले इलाकों और यहूदियों के रिहायशी इलाकों पर भी हमला बोल दिया. धीरे धीरे इस युद्ध में सऊदी अरब के साथ मिस्र भी अरब सेना के साथ मिल गए.
डटा रहा इजराइल
लेकिन इतने देश मिलकर भी इजराइल को हरा नहीं सके. यह युद्ध 9 महीने और 23 दिन तक चला. शुरू में इजराइल के पार 30 हजार लड़ाके थे लेकिन युद्ध खत्म होते होते उनकी संख्या एक लाख 17 हजार तक पहुंच गई. हैरानी की बात यह है कि सऊदी अरब, उत्तरी यमन, लेबनान, सीरिया, ईराक, ट्रांसजॉर्डन, मिस्र, मिलकर भी इजराइल को हरा नहीं पाए.
इजराइल को पहले दिन से ही अपने आस पास के देशों से हमले का सामना करना पड़ा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
छह हजार से ज्यादा जाने गईं
बेशक इस युद्ध में इजराइल की जीत हुई, लेकिन यह छोटा युद्ध नहीं था. इसमें 6400 लोगों की जान चली गई थी. इसमें से 4 हजार सैनिक थे.इसी युद्ध के दौरान ही इजराइल ने अपनी सेना को मजबूत करने काम शुरू किया और हिम, इरगुन, हगनह, पालमैक, हिश, और लेकी जैसे कई सैन्य गुट बने जो बाद में एक होकर इजरायल डिफेंस फोर्सेस के रूप में एकीकृत हो गए.
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छह दिन का युद्ध
इसके बाद इजराइल सेना मजबूत ही होती गई. 1967 में दूसरी बार जब अरब देशों ने इजरायल पर हमला किया तो महज 6 दिन में इजरायल ने यह जंग जीत कर भी एक बार फिर अरब सेना को हार का स्वाद चखा दिया. 6 दिन के युद्ध के नाम से जाने वाले इस युद्ध के बाद इजरायल ने येरुशलम पर कब्जा कर अपनी राजधानी बना लिया.

1980 में इजराइल ने येरूशलम को अपनी राजधानी बनाने का ऐलान कर दिया था. (फाइल फोटो)
जारी रही तनातनी
इसके बाद अक्टूबर 1973 को सीरिया और मिस्र ने अचानक इजराइल पर हमला किया, लेकिन दोनों को ही बहुत नुकसान हुआ. 1977 के बाद से इजराइल और मिस्र के बीच समझौते के प्रयास शुरू हुए, लेकिन इस बीच लेबनानी आतंकियों ने 1978में इजराइल के 35 नागरिकों की हत्या कर दी जिसका इजराइल ने भी माकूल जवाब दिया. 1980 में इजराइल ने येरूशनम को अपनी राजधानी बनाने का ऐलान कर दिया.
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इस के बाद बीच इजलाइल पर फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन पीएलओ के हमले होते रहे और उसका जवाब भी इजराइल कभी लेबनान तो कभी सीरिया पर हमला कर देता रहा. 1992 में इजराइल फिलिस्तीनी समझौता हुआ. 1994 में इजराइल जोर्डन शांति समझौता हुआ. नई सदी की शुरुआती दशक में हिंसा की घटनाएं इजराइल फिलिस्तीन दोनों तरफ से दिखीं, लेकिन युद्ध की स्थिति नहीं बनीं. 2010 के दशक में स्थिति में बदलाव हुआ और इजराइल की प्रतिद्वंदता अरब देशों से ज्यादा ईरान पर केंद्रित हो गई और सीरिया के गृहयुद्ध में भी ईरान के गुटों की सक्रियता इजराइल तक पहुंचते दिखी जिस पर इजराइल ने कई बार कार्रवाई की. कुल मिलाकर इजराइल अब भी युद्ध के हालात का सामना कर रहा है और उससे निपटने के लिए तैयार भी है.
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FIRST PUBLISHED : May 14, 2023, 07:02 IST








