माल्टा से हिंदुस्तान लाई जा रही शहीद-ए-माल्टा की क़ब्र की मिट्टी, कोड़ा जहानाबाद में बनेगा स्मारक

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जहानाबाद फतेहपुर—

भारत की आज़ादी की लड़ाई में परदेश की धरती पर शहादत देने वाले स्वतंत्रता सेनानी शहीद हकीम सैयद नुसरत हुसैन साहब की स्मृतियों को सहेजने की ऐतिहासिक पहल की जा रही है। माल्टा (यूरोप) की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में कार्यरत व रिसर्च स्कॉलर उर्फ़ी रज़ा ज़ैदी तुर्किश एम्बेसी के माध्यम से मारसा टर्किश सेमिटरी, माल्टा से शहीद की क़ब्र की मिट्टी हिंदुस्तान ला रहे हैं। यह मिट्टी शहीद के पैतृक कस्बे कोड़ा जहानाबाद, जनपद फतेहपुर में बनने वाले स्मारक में स्थापित की जाएगी।
इस अवसर पर उर्फ़ी रज़ा ज़ैदी की शोध-आधारित पुस्तक “शहीद-ए-माल्टा: हकीम सैयद नुसरत हुसैन” का विमोचन भी प्रस्तावित है। कार्यक्रम में माल्टा व तुर्की सहित कई देशों के राजदूतों, राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों और देवबंद के प्रसिद्ध मदनी परिवार के लोगों की उपस्थिति की उम्मीद जताई जा रही है।
खिलाफ़त आंदोलन और सिल्क लेटर कॉन्सपिरेसी से जुड़ा इतिहास
प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की ख़िलाफ़त को समाप्त किए जाने के विरोध में भारत में शुरू हुए खिलाफ़त आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। अली बंधुओं (मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली) के नेतृत्व में यह आंदोलन गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़ा और हिंदू–मुस्लिम एकता का प्रतीक बना।
इस आंदोलन को ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध निर्णायक चुनौती में बदलने के लिए शेख़ुल-हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, हकीम सैयद नुसरत हुसैन समेत कई नेताओं ने अफ़ग़ानिस्तान व तुर्की से समर्थन जुटाने की रणनीति बनाई। इसी क्रम में मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी द्वारा रेशमी रूमाल पर लिखे गए गोपनीय पत्र पकड़े गए, जिसे अंग्रेज़ों ने ‘सिल्क लेटर कॉन्सपिरेसी केस’ नाम दिया।

माल्टा की कैद और शहादत

हिजाज़ से गिरफ़्तारी के बाद इन नेताओं को मिस्र होते हुए 15 फरवरी 1917 को माल्टा के वरडाला फोर्ट (तत्कालीन कॉन्सेंट्रेशन कैंप) भेजा गया, जहाँ तीन वर्षों तक कठोर यातनाएँ दी गईं। अंग्रेज़ी हुकूमत ने हकीम नुसरत हुसैन से आंदोलन की जानकारी उगलवाने की कोशिश की, पर वे अडिग रहे। रिहाई के बदले जानकारी देने के प्रस्ताव को ठुकराते हुए उन्होंने कहा— “अकेला आज़ाद होने से बेहतर है यहाँ मर जाना; साथियों के बिना रिहाई स्वीकार नहीं।”
लगातार अत्याचारों के बीच वे माल्टा की धरती पर शहीद हो गए। उन्हें तुर्की ख़लीफ़ा की सीक्रेट सर्विस के अधिकारी अशरफ़ बे ने अपने खर्च पर दफ़नाया।

स्मारक से नई पीढ़ी को प्रेरणा

शहीद की क़ब्र की मिट्टी के साथ प्रस्तावित स्मारक और पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का उद्देश्य देश की नई पीढ़ी को उस गुमनाम शहादत से परिचित कराना है, जिसने आज़ादी की इमारत में अपना अमिट योगदान दिया।

Up Head Line
Author: Up Head Line

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