हिमालयी पहाड़ों में क्‍यों बढ़ रहीं भूस्‍खलन की घटनाएं, कैसे रोकी जाएं, क्‍या कहते हैं पर्यावरणविद्

Landslide in Himalayan Range: उत्‍तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश शुरू होते ही लैंडस्‍लाइड भी शुरू हो गया है. भूस्‍खलन में कुछ लोगों की मौत हो गई है. पिछले कुछ साल में मानसून के दस्‍तक देते ही हिमालयी पहाड़ों में भूस्‍खलन की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. हिमाचल प्रदेश में कालका-शिमला राष्‍ट्रीय राजमार्ग-5 पर भूस्‍खलन हुआ. इससे कई किमी लंबा जाम लग गया. इससे स्‍थानीय लोगों के साथ ही पर्यटकों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. वहीं, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में भी लैंडस्लाइड की घटना हुई. इनके अलावा हिमाचल में कई जगह भूस्‍खलन हुआ है.

मानसून की बारिश के कारण हुए भूस्‍खलन से भारत और चीन सीमा को जोड़ने वाली तवाघा-लिपुलेख सड़क बंद हो गई. हालात ऐसे बन गए हैं कि मौसम विभाग को उत्तराखंड में 30 जून तक का रेड अलर्ट जारी करना पड़ा है. कुछ साल से हिमालयी पहाड़ों में भूस्‍खलन की घटनाओं की संख्‍या में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. इस वजह से जान-माल का काफी नुकसान भी हुआ है. जानते हैं कि हिमालय क्षेत्र में पड़ने वाले उत्‍तराखंड और हिमाचल में भूस्‍खलन की घटनाएं बढ़ने की वजह क्‍या है?

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भारी बारिश में क्‍यों दरकने लगते हैं पहाड़
पर्यावरणविदों का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में लगातार सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों ऊपर से काटा जा रहा है. इससे भूस्‍खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं. दरअसल, ऊपर से पहाड़ को काटने पर उसका निचला हिस्सा कमजोर हो रहा है. ऐसे में भारी बारिश भूस्‍खलन के खतरे को और बढ़ा देती है. एक अध्‍ययन के मुताबिक, इस साल ऋषिकेश से जोशीमठ के बीच 309 भूस्खलन की घटनाएं हुई हैं. दरअसल, कुछ साल में हिमालयी इलाकों में इंसानी गतिविधियों के बढ़ने से पहाड़ों का संतुलन बिगड़ रहा है. इससे बारिश के मौसम में उनकी नींव कमजोर होती है और पहाड़ टूटकर गिरने लगते हैं.

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हिमालय क्षेत्र में सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों काटा जा रहा है. इससे भूस्‍खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं.

‘कचरे व मलबे का ढेर हैं हिमालय के पहाड़’
पर्यावरण कार्यकर्ता राजीव नयन बहुगुणा ने कहा कि हिमालय के पहाड़ अभी अपनी शैशव अवस्‍था में हैं. इन्‍हें कचरे और मलबे का ढेर भी कहा जा सकता है. जोशीमठ, मसूरी, गंगटोक, जम्‍मू, नैनीताल, भीमताल जैसे तमाम हिमालयी हिल स्‍टेशंस में भूस्‍खलन व जमीन धंसने की समस्‍या आम है. उन्‍होंने कहा कि धरासू से लेकर भैरव घाटी तक उत्‍तरकाशी की पूरी बेल्‍ट में आए दिन सड़कों के दरकने की घटनाएं होती हैं.

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जंगलों को काटना खतरनाक साबित होगा
राजीव नयन बहुगुणा का कहना है कि पुरानी टिहरी को डुबोकर नई टिहरी बनाई गई है. इसे बसाने के लिए जंगलों को काटकर सीमेंट और कंक्रीट से निर्माण कार्य किया गया. उनका कहना है कि काटे गए जंगल हिमालय के लिए स्‍पंज का काम करते थे. इन्‍हें काटना खतरनाक साबित होता रहेगा क्‍योंकि इन जंगलों की वजह से ही मैदान की गर्म हवा पहाड़ों तक नहीं पहुंच पाती थी. उन्‍होंने कहा कि अंग्रेंजों के किए गए निर्माण कार्य में आपको कहीं भी पक्‍की छत नहीं मिलेगी. वे निर्माण कार्य में ज्‍यादा से ज्‍यादा लकड़ी का इस्‍तेमाल करते थे. वहीं, छत टीन की बनाई जाती थी. इससे पहाड़ों पर बहुत ज्‍यादा बोझ नहीं पड़ता था.

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हिमालय के पहाड़ अभी अपनी शैशव अवस्‍था में हैं. इन्‍हें कचरे और मलबे का ढेर भी कहा जा सकता है.

भूस्‍खलन को होने से कैसे रोका जा सकता है
आजाद भारत में हिल स्‍टेशंस पर किए गए ज्‍यादातर नए निर्माण में सीमेंट और कंक्रीट का भारी मात्रा में इस्‍तेमाल किया गया. अगर पहाड़ों को बचाना है तो सरकार को भारी निर्माण कार्यों पर तुरंत रोक लगानी चाहिए. पहाड़ों की सैर करने आने वाले सैलानियों को रोकना बेशक मुश्किल है. लेकिन, उन्‍हें समझना होगा कि वे यात्रा के दौरान कम से कम सुविधाओं में अपना काम चलाएं. पर्यटकों की मांग को पूरा करने के लिए भारी निर्माण नहीं किया जाएं तो काफी हद तक पहाड़ों पर दबाव कम हो सकता है. इसके अलावा ये भी जरूरी है कि पहाड़ों की तलहटी के तराई क्षेत्रों के जंगलों को काटने से परहेज किया जाए.

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Author: Jagran Times

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