देवशयनी एकादशीः देश में केवल दो ही ऐसे मंदिर, मध्य प्रदेश और मराठाओं से है खास नाता


अनुज गौतम/सागर: मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में श्री देव पंढरीनाथ का एकमात्र मंदिर है, जिसमें विट्ठल भगवान का विग्रह स्थापित है. यह मंदिर 300 साल पुराना है. ऐसा बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना सागर के मराठों के ओर से की गई थी. इसी तरह का मंदिर महाराष्ट्र के पंढरपुर में है, उसी की प्रतिकृति के रूप में यह दुर्लभ मंदिर रहली के वार्ड नंबर 12 में स्थित है.

विट्ठल भगवान का यह मंदिर दो नदियों के संगम पर स्थित है. महाराष्ट्र के पंढरपुर में स्थित यह मंदिर रथ की आकार में बना हुआ है. यह पंढरीनाथ मंदिर भीमा और कुंठा नदी के संगम पर स्थित है. इसी तरह सागर के रहली में भी देहार और सुनार नदी के संगम पर पंढरीनाथ मंदिर स्थित है. यहाँ नदी का आकार चंद्राकार में है, इसलिए इसे चंद्रभागा भी कहते हैं.

बड़े पंढरपुर में भी उस नदी को चंद्रभागा कहा जाता है. बड़े पंढरपुर में दीपस्तंभ में बने हुए बड़ा प्रांगण है और उसके सामने भगवान की विग्रह स्थापित है, जो गर्भगृह में स्थित है. इसी तरह का मंदिर रहली के पंढरपुर में भी है, जो अत्यंत प्राचीन है. इस तरह के मंदिरों में केवल दो ही प्रमुख स्थान हैं. दो साल पहले यहां महाभारत सीरियल में श्री कृष्ण का रोल निभाने वाले अभिनेता नितीश भारद्वाज भी आए थे, जिन्होंने विट्ठल जी का अभिषेक किया था.

महामहोत्सव का होगा आयोजन 

देवशयनी एकादशी पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम यहां पर महोत्सव के रूप में मनाए जाते हैं. 29 जून से गुरु पूर्णिमा तक यहां पर महामहोत्सव मनाया जाएगा. देवशयनी एकादशी के दिन सुबह से पंचामृत से अभिषेक होगा. दोपहर में भगवान की चरण पादुका नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे वहां से लौटने के बाद जलविहार के लिए जाएंगे. फिर मंदिर में प्रवेश करेंगे जब चरण पादुका मंदिर में प्रवेश करेंगी तो महिलाओं की ओर से उनका स्वागत,आरती और पूजा की जाएगी.  फिर 30 जून से 2 जुलाई तक शाम को तीन दिवसीय हरि कथा होगी.

दही हांडी की अनोखी प्रथा 

हर साल गुरू पूर्णिमा पर 3 जुलाई को यहां मेले का आयोजन किया जाएगा, फिर उसमें दही हांडी टूटेगी. इस दौरान छोटे-छोटे बच्चे राधा कृष्ण के रूप में झांकी सजाते हैं. ऐसी मान्यता है कि हांडी टूटने के बाद उसके दो टुकड़े बिखरते हैं उनको घर ले जाने से धन-धान्य की वृद्धि होती है सुख समृद्धि रहती है और फिर भगवान की महाआरती के साथ भगवान 4 महीने के लिए शयन काल में चले जाते हैं.

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Author: Jagran Times

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