
भोपाल. मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं. हवा के रूख की तरह नेता और पार्टियां चुनावी रंग में बदल रही हैं. साम-दाम-दंड-भेद की तरह हर दांव आजमाए जा रहा हैं. पार्टियों के अंदर उठापठक और घमासान है. घात-प्रतिघात से लेकर भीतरघात है. इन खबरों को भले ही पार्टियां राज रहने दें लेकिन न्यूज 18 ‘अनकही राजनीति!’ कालम के जरिए आपके सामने बेपर्दा कर रहा है…
जीजाजी हमारे राष्ट्रीय नेता, इसलिए हमको चाहिए टिकट
जीजा-साले के किस्से आपने खूब सुने होंगे. बेचारे जीजाओं को न चाहकर भी अपनी पत्नी की वजह से साले साहबों को लाड साहब मानना पड़ता है. राष्ट्रीय स्तर के एक नेताजी के साले साहब को यह फंडा अच्छे से पता है. लिहाजा, अपने जीजा की धौंस दिखाकर उन्होंने प्रदेश कार्यालय में धमक दर्ज करा दी है. भोपाल में बड़े नेताओं को टिकट के लिए अपना लंबा चौड़ा बायोडाटा भी थमा दिया है. साथ ही, अपने इलाके में जाकर प्रचार भी शुरू कर दिया है. अब साले साहब को टिकट मिले या न मिले पर जीजाजी का बीपी बढ़ना लाजिमी है. गौरतलब है कि राष्ट्रीय नेताजी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी से ताल्लुक रखते हैं और इनकी ससुराल महाकौशल इलाके में है.
संगठन में मलाई नहीं मिली इसलिए अब चुनाव लड़ने की जुगत
सत्ताधारी दल के एक नेताजी का मन अब मध्य प्रदेश में बिल्कुल नहीं लग रहा है. वजह यह कि नेताजी है तो प्रभारी लेकिन न तो संगठन में चल रही है और न सरकार में. यह जो भी काम सरकार या संगठन के मुखिया को बताते हैं तो इन्हें मना कोई करता नहीं है लेकिन काम भी नहीं होता है. यानी मलाई से दूरी बनी हुई. लिहाजा, नेताजी के मन में अब चुनाव लड़ने की इच्छा जागृत हो गई है और इस इच्छा की पूरी करने के लिए पार्टी के कार्यक्रमों के बहाने अपने गृह राज्य के लगातार दौरे कर रहे हैं.
विधायक बनने की ख्वाहिश में पार्टी दफ्तर से गायब हुए प्रवक्ता
चुनावी साल है तो हर किसी के मन में ख्वाइश है कि वो चुनाव लड़े और विधायक बन जाए. फिर भला प्रवक्ता भी कहां पीछे रहने वाले थे. भाजपा के तीन मौजूदा और एक पूर्व प्रवक्ता भी अलग-अलग इलाके से टिकट की मांग कर रहे हैं. इतना ही नहीं है इनमें से कुछ ने तो प्रचार भी शुरू कर दिया है. इस वजह भाजपा कार्यालय में बैठने के लिए प्रवक्ता ही नहीं मिल रहे हैं. जो प्रवक्ता कार्यालय में मिलते हैं वे कांग्रेस से कुछ महीने पहले ही भाजपा में शामिल हुए हैं. हालांकि हाल ही में नियुक्त मीडिया प्रभारी जरूर कार्यालय में बैठकर मीडिया से समन्वय का काम कर रहे हैं.
दो आईपीएस अब बनना चाहते हैं विधायक
दो आईपीएस भी चुनावी मैदान में कूद सकते हैं. यह दोनों ही आईपीएस सीधी भर्ती के अधिकारी हैं. इनमें से एक अगले महीने रिटायर होने वाले हैं और राजस्थान से टिकट मांग रहे हैं. इसके लिए वे लंबे समय से अपने इलाके में हैल्थ कैंप लगवा रहे हैं. उनकी पहचान कवि के तौर पर भी होती है. वे भाजपा के संपर्क में है. वहं, दूसरे आईपीएस की सरकार से नहीं बन रही है. लिहाजा, साहब ने चुनाव लड़ने की खातिर वीआरएस मांग लिया है. हालांकि, सरकार ने उनकी मंशा भांप ली है और उनका वीआरएस वाला आवेदन खारिज कर दिया.
चलो-चलो खत्म, अब आओ-आओ शुरू
अपने मुख्यमंत्रित्व काल में चलो-चलो कहने वाले नेताजी ने अब खुद को बदल लिया है. अब वे सबको आओ-आओ कह रहे हैं. पहले इनसे बिना अपाइंटमेंट के मिलना लगभग असंभव हुआ करता था लेकिन अब सीधे बंगले जाकर आम व्यक्ति भी मिल लेता है. लोग अब कहने लगे हैं कि चुनावी हार-जीत ने इन्हें लोकल की राजनीति भी सिखा दी है. आलम यह है कि अब नेताजी का दिन सुबह पांच बजे से शुरू होता है और देर रात में एक बजे तक वे सक्रिय रहते हैं.
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कथा-पुराण करवाओ, वोट के रूप में आर्शीवाद पाओ
चुनावी साल में इस बार सबसे ज्यादा मजे बाबाओं और पंडितों की हो रही हैं. मजेदार बात यह है कि यह बाबा-पंडित भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टी के नेताओं के लिए काम कर रहे हैं. पहले यह बाबा-पंडित सीधे किसी पार्टी का प्रचार करने लगते थे. लेकिन अब प्रोफेशनल हो गए हैं. यानी जो पैसा दे उसका समर्थन कर दो. पार्टी की बजाय उम्मीदवार पकड़ो. लिहाजा, अब यह नहीं कहा जा सकता है कि यह बाबा-पंडित किसी पार्टी विशेष का समर्थक है.
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FIRST PUBLISHED : June 21, 2023, 20:15 IST






