
भोपाल. ‘खूनी भण्डारा’, यह नाम सुनकर ही शरीर में सिहरन दौड़ पड़ती है. रामसे ब्रदर्स और रामगोपाल वर्मा की हॉरर फिल्मों की याद आ जाती है. लेकिन डरिए मत. इस खूनी भंडारा को देखने और इसे पास जाकर जानने-समझने से कोई नहीं डरता. यह ‘खूनी भण्डारा’ खौफ का नहीं, सेहत और खुशी देने वाली जिंदगी की निशानी है. जल संरक्षण और जलापूर्ति प्रणाली की अद्भुत मिसाल. बेमिसाल इंजीनियरिंग के जरिए भूमिगत जलसुरंगों से जुड़ा यह ‘खूनी भंडारा’ दुनियाभर में मशहूर वो नायाब नमूना है, जिसका पानी पूरा बुरहानपुर शहर पीता है. इसके भीतर छुटी आड़ी-तिरछी जल सुरंगें इतनी लंबी हैं कि आप घोड़े पर बैठकर उनके भीतर से मीलों तक का सफर कर सकते हैं. आइए जानते हैं मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के रहस्यमयी ‘खूनी भण्डारे’ के इतिहास और उसे बनाने वाले वाले के बारे में.
इन जलसुरंगों का इतिहास करीब पांच सदी पुराना है. फारुखी शासनकाल के पतन के बाद 1600 ईसवी के प्रारंभिक दौर में मुगल बादशाह अकबर ने असीरगढ़ (बुरहानपुर) पर विजय हासिल की थी. अकबर ने इसकी सत्ता बेटे को सौंपी और उसके सूबेदार बनाए गए अब्दुल रहीम खानखाना. जी, हां वही रहीम, जिनका पानी से गहरा संबंध उनके लिखे इस दोहे से समझ सकते हैं,
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी बिना न उबरे, मानस, मोती, चून।।
बुरहानपुर के इतिहासवेत्ता डॉ. मो. शफी की लिखी इबारत के मुताबिक कि ये वो दौर था, जब बुरहानपुर पानी के संकट से जूझ रहा था. हालांकि पास में ही ताप्ती नदी बहती थी, लेकिन रियासतदारों को यह चिंता खाए जाती थी कि नदी में अगर किसी दुश्मन ने जहर मिला दिया, तो क्या होगा. ऐसे में रहीम पानी के नए प्रबंधन की खोज में जुट गए. सतपुड़ा पर्वत शृंखला की पहाड़ियों के तराई क्षेत्र में खुदाई के बाद मीठे और खनिज तत्वों से भरपूर जलधाराओं का पता चला. इसके बाद रहीम खानखाना ने ऐसी अद्भुत जल संचय प्रणाली तैयार कराई, जो पांच सदियों के बाद भी बुरहानपुर को पानी पिला रही है. दुनियाभर में जल की चिंता करने वाली जलबिरादरी के बीच खूनी भण्डारे का जिक्र किए बिना बात अधूरी रहती है.
अंडर-ग्राउंड नहर यानी जलसुरंग
मुगल शासनकाल में निर्मित धरोहर में यदि सबसे बेहतर किसी चीज को माना जाता है, तो वह है यहां के जल भण्डार, जिनमें से एक है ‘खूनी भण्डारा’. इसके साथ ही खास हैं वह प्राचीन भूमिगत नहरें, जिन्हें जल सुरंगों की शक्ल में जमीन के अंदरूनी हिस्से को काटते हुए तराशे पत्थरों से बनाया गया है. इन प्राचीन सुरंगों को ‘कुंडी’ भी कहा जाता है. सुरंगें खास स्टाइल से बनाई गई हैं. ऊंचाई इतनी रखी गई है कि इनमें से घोड़े पर सवार व्यक्ति भी गुजर सकता है. इन सुरंगों के रास्ते में बनी कुंडियों में ऊपर से रस्सी डालकर अनेक स्थानों पर आज भी पानी लिया जाता है. कुंडियों में लगभग 10 मीटर नीचे पानी एकत्रित होता है और कुंडियों के बीच की दूरी 20 से 30 मीटर की है. इन जल सुरंगों से जामा मस्जिद तक पानी पहुंचाया जाता था, वहां से शहर के लिए सप्लाई होता था.
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चतुर कारीगरों की नायाब निशानी
इन जलसुरंगों की विशेषता यह थी कि इसमें बिना किसी मदद के शहर तक पानी पहुंच जाता था. न बिजली की जरूरत, न किसी मोटर या इंजन की. इन्हें बनाने वाले उस दौर के लोग थे, जो इंजीनियरिंग का क ख ग घ भी नहीं पढ़े थे. चतुर कारीगरों ने पहले पत्थरों से सुरंग बनाई, फिर उसमें पानी प्रवाहित किया गया. ये सुरंगें आज भी बीते समय की तकनीकी कुशलता, कारीगरी की याद दिलाती हैं, जो अद्भुत, अविश्वनीय है.
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क्यों पड़ा ‘खूनी भण्डारा’ नाम
बुरहानपुर में चार जल भण्डार हैं- ‘सूखा भण्डारा’, ‘मूल भण्डारा’, ‘चिंताहरण भण्डारा’ और ‘खूनी भण्डारा’. इन सब भण्डारों में खास है मुगलकालीन ‘खूनी भण्डारा’. मप्र में जल संरक्षण की परंपरा पर काम करने वाले क्रांति चतुर्वेदी, इतिहासवेत्ता मो. शफी के हवाले से बताते हैं, “संभवतः इस नाम ‘खूनी भण्डारा’ इसलिए पड़ गया होगा, क्योंकि यह बुरहानपुर रूपी शरीर के लिए उसी भूमिका में है, जिस तरह मानव शरीर में खून की भूमिका होती है. यदि खून नहीं है तो जिस्म कैसे काम करेगा.” यह भाव उस समय में जल प्रबंधन प्रणाली की महत्ता को भी दर्शाता है. खूनी भण्डारे से जुड़ी 103 कुंडियां बनी हुई हैं. बाकी के भण्डारे भी सुरंगों और कुंडियों के माध्यम से खूनी भण्डारे से जुड़े हुए हैं. ये भण्डारे सतह से 80 फीट नीचे हैं, जहां हौज में कुंडियों के पानी आने के अलावा दीवारों से भी बूंद-बूंद रिसकर पानी आता है.
बूंदों का ‘अंडर-ग्राउंड ताजमहल’
खूनी भण्डारे और सुरंगों की दीवारें ऐसी लगती है मानो संगमरमर की बनी हैं. इसका कारण दीवारों पर जमी केल्शियम की परत है. इसलिए बुरहानपुर के लोग इस ‘खूनी भण्डारे’ को पानी का ‘भूमिगत ताजमहल’ भी कहते हैं. यहां के लोग की सरकार से एक ही गुहार है कि जर्जर होते जल भण्डारों और जल सुरंगों को बचा लीजिए, वरना मिट जाएगी यह ऐतिहासिक विरासत. लोगों का दर्द इसलिए भी, कि जमीन के ऊपर बने ताज को तो पूरी तवज्जो दी जा रही, लेकिन दुनिया की जल बिरादरी में जिस भूमिगत ताज की वजह से बुरहानपुर की ख्याति है, उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा.
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FIRST PUBLISHED : June 21, 2023, 14:24 IST






