
हिमांशु जोशी/पिथौरागढ़.उत्तराखंड की बहुमूल्य वन संपदा को हर साल वनाग्नि से काफी नुकसान पहुंचता है और तमाम पादप और जीव-जंतु इस आग में झुलस कर शिकार हो जाते है. गर्मी जैसे-जैसे बढ़ रही है वैसे ही पिथौरागढ़ के आसपास के जंगलो में आग लगने का सिलसिला भी बढ़ते जा रहा है. जंगलों की आग से निपटना वन विभाग के सामने एक मुश्किल चुनौती है. समय रहते आग पर काबू न पाने की स्थिति में तस्वीरें काफी भयावह हो जाती है और चारों तरफ दिखती है तो सिर्फ तबाही.
उत्तराखंड में जंगलो की आग एक गंभीर समस्या है. गर्मियां बढ़ने के साथ ही जंगलो में आग लगने का खतरा भी बढ़ जाताहै,जिससे बेशकीमती वन संपदा जलकर खाक हो जाती है .बात अगर पिथौरागढ़ जिले की करें तो साल की शुरुआत से ही अभी तक 36 ग्राम पंचायतों के 38 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल आग के कारण बर्बाद हो चुका हैं. जिससे लाखों की संपति का नुकसान अभी तक हो चुका है और आग लगने का सिलसिला जारी है.
जानवर-मानव संघर्ष की आशंका बढ़ी
जंगलो को आग से बचाने के लिए वन विभाग द्वारा अपने स्तर से हर संभव तरीके अपना रहा है है. आग के कारण जंगलो से जानवरों का दूसरे इलाके की ओर रुख कर रहे है जिससे जानवर-मानव संघर्ष की संभावना भी बढ़ी है.इसके साथ ही तमाम जीव-जंतुओ के अस्तित्व पर खतरा भी मंडरा रहा है. जो पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या है. वनों को आग से बचाने के लिए वनाधिकारी विजय मोहन दगाड़े ने लोगों से आग की सूचना समय से देने और जंगलों में संदिग्ध लोगों के प्रवेश पर रोक लगाने की बात भी कही है.
भौगोलिक स्थिति के कारण आग पर काबू पाना मुश्किल
जंगलों की आग से पर्यावरण को नुकसान तो होता ही है साथ ही यह इंसानों की सेहत के लिए भी हानिकारक है.जंगलों में लगी आग से निकलने वाले धुएं से कई प्रकार की बीमारियां भी जन्म लेती हैं.पिथौरागढ़ जिला अस्पताल के मुख्य फिजिशियन डॉ.डीएस धर्मसत्तू ने जानकारी देते हुए बताया कि इस आग से फैले धुंए से दमा की बीमारी हो सकती है और सांस के रोगियों के लिए यह ठीक नहीं है.पहाड़ की भौगोलिक स्थिति और संसाधनों के अभाव के कारण जंगलो में लगी आग को रोक पाना नामुमकिन ही नजर आता है,लेकिन इससे होने वाले नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है.
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FIRST PUBLISHED : June 20, 2023, 16:47 IST






