
इसी साल 16 फरवरी को मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में “आदि महोत्सव” का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि “पहले जो खुद को दूर-सुदूर समझता था अब सरकार उसके द्वार जा रही है, उसको मुख्यधारा में ला रही है. आदिवासी समाज का हित मेरे लिए व्यक्तिगत रिश्तों और भावनाओं का विषय है. 21वीं सदी का नया भारत ‘सबका साथ सबका विकास’ के दर्शन पर काम कर रहा है.” प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि आदिवासी समाज के विकास से ही “सबका विकास” सधेगा और इसी कारण केंद्र सरकार बीते कुछ वर्षो ने आदिवासी जनजातीय समाज के लिए मिशन मोड में काम कर रही है ताकि उनके जीवन के सभी आयामों को बेहतर किया जा सके.
इसकी एक झलक इसी साल आम बजट के दौरान भी मिली जब वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2023-2024 में जनजातीय मामलों के लिए 15,000 करोड़ रुपये आवंटित किए. यह पिछले साल घोषित राशि से लगभग पांच गुना अधिक थी. तमाम योजनाओं और घोषणाओं के साथ बजट का फोकस उत्तर पूर्व के राज्यों सहित सभी राज्यों की जनजातीय आबादी पर रहा. इसके अलावा कई राजनीतिक और सामाजिक कदम भी उठाये गए ताकि आदि समाज को सशक्त किया जा सके. इसमें सबसे प्रमुख कदम रहा आदिवासी जनजातीय समाज से आने वाली श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद पर आसीन करवा कर मोदी सरकार ने आदिवासियों का गौरव बढाया. आज देश में लगभग 600 से अधिक आदिवासी जातियां है लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों में इन्हे वो पहचान नहीं मिली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदिवासी क्रांतिकारियों का सम्मान करते हुए उनके लिए स्मारक बनाएं और 15 नवंबर बिरसा मुंडा की जयंती पर देश के इतिहास और संस्कृति में जनजातीय समुदायों के योगदान को याद करने के लिए जनजातीय गौरव दिवस के रूप में घोषित किया.
सामाजिक गौरव के अतिरिक्त जीवन स्तर से जुड़े मुद्दों का अध्ययन करें तो पायेंगे कि जनजातीय लोगों का जीवन स्तर पहले से अच्छा हुआ है. शिक्षा के मोर्चे पर प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक में आदिवासी बच्चों का इनरोलमेंट बढ़ा है. 2004 से 2014 के बीच केवल 90 ‘एकलव्य स्कूल’ खुले थे, जबकि 2014 से 2022 तक मोदी सरकार ने 500 से ज्यादा ‘एकलव्य स्कूल’ स्वीकृत किए जिनमें से 400 से ज्यादा स्कूलों में पढ़ाई शुरू भी हो चुकी है और एक लाख से ज्यादा जनजातीय छात्र इन स्कूलों में पढ़ाई भी करने लगे हैं. आदिवासी युवाओं के सामने शिक्षा के मैदान में सबसे बड़ी चुनौती भाषा की होती आई है लेकिन अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा में पढ़ाई का विकल्प भी खोल दिया गया है. जिस कारण आदिवासी बच्चे, आदिवासी युवा अपनी भाषा में पढ़ सकेंगे. स्वास्थ्य सुविधाओं में “आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना” में करीब 91.93 लाख आयुष्मान कार्ड के लाभार्थी जनजातीय वर्ग से ही हैं. इसके अतिरिक्त लगभग 68 लाख जनजातीय लोग प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत आवास के लिए पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग 63 लाख आवास मंजूर हो चुके हैं. इनमें से भी 47.17 लाख आवासों का निर्माण पूरा हो चुका है. इसके अतिरिक्त स्वच्छता मिशन के तहत 2014-2015 से लेकर अभी तक जनजातीय वर्ग के 1.47 करोड़ घरों में शौचालय का निर्माण हुआ है. अगले तीन वर्षों में 3.5 लाख आदिवासी छात्रों वाले 740 एकलव्य माडल आवासीय विद्यालयों के लिए 38,800 शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों की केंद्रीय रूप से भर्ती की जाएगी. इसके अतिरिक्त अब 5 छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत 2500 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक बजट के साथ प्रत्येक वर्ष 30 लाख से अधिक छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है.
इसके अतिरिक्त व्यापारिक उत्कर्ष का भी सुनहरा दौर दस्तक दे रहा है. देश के अलग-अलग राज्यों में तीन हजार से अधिक ‘वन धन विकास केंद्र’ स्थापित किए गए हैं. लगभग 90 लघु वन उत्पादों पर सरकार MSP दे रही है. 80 लाख से ज्यादा सेल्फ हेल्फ ग्रुप आज अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे हैं जिसमें सवा करोड़ से ज्यादा सदस्य जनजातीय समाज से हैं और इनमें भी बड़ी संख्या महिलाओं की है. मोदी सरकार का जोर जनजातीय कला को प्रमोट करने, और युवाओं के कौशल को बढ़ाने पर भी है. देश में नए जनजातीय शोध संस्थान खोले जा रहे हैं. इन प्रयासों से जनजातीय युवाओं के लिए उनके अपने ही क्षेत्र में नए अवसर बन रहे हैं. इसी कारण आज भारत के जनजातीय समाज द्वारा बनाए जाने वाले उत्पादों की मांग ना केवल भारत में लगातार बढ़ रही है बल्कि ये विदेशों में भी निर्यात किए जा रहे हैं. ट्राइबल प्रोडक्ट्स ज्यादा से ज्यादा बाजार तक आयें, इनकी पहचान बढ़े, इनकी डिमांड बढ़े, केंद्र सरकार इस दिशा में भी लगातार काम कर रही है.
आदिवासी जनजातीय समाज के साथ प्रधानमंत्री मोदी का अनुभव तब से है जब वो सक्रिय राजनीति में नहीं थे और एक प्रचारक के तौर पर समाज में काम करते थे. बकौल मोदी “तब मैं आदिवासी समुदायों और परिवारों के पास जाता था और उनके साथ पर्याप्त समय बिताता था. मैंने आदिवासी समाज की प्रथाओं से सीखा भी है और जिया भी है. हम कैसे प्रकृति से संसाधन लेकर भी उसका संरक्षण कर सकते हैं इसकी प्रेरणा हमें हमारे आदिवासी समाज से मिलती है.” शायद इसी कारण मोदी आदिवासी जनजातीय समाज की दुश्वारियों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझते हैं और ये बात भी कि बिना इस आबादी के उत्थान से अन्तोदय का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता.
( डिसक्लेमर – लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
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FIRST PUBLISHED : June 16, 2023, 00:10 IST






