
Women’s Rights Are Human Rights : सीमोन द बोउवार का जन्म 1908 में पेरिस के एक मध्यमवर्गीय कैथलिक परिवार में हुआ था. सीमोन ने अपनी किताब द सेकंड सेक्स (The Second Sex) के माध्मय से औरतों को अलग-अलग रूपों को प्रस्तुत किया, इसलिए उनके लेखन के बारे में एक तटस्थ विचार रखना बेमानी होगी. ये सच है कि लेखक और पाठक के बीच में एक खास आत्मीय रिश्ता होता है, जो भी पाठक को अपने जीवन के करीब लगता है उसे वो अपने लिए उठा लेता है. यदि कोई किताब कल्पनाओं से बाहर निकल कर मनुष्य के मनोविज्ञान और सामाजिक परिस्थितियों को समझते हुए लिखी जाती है, तो वो एक खास वर्ग से थोड़ा ज्यादा करीब से जुड़ जाती है. ऐसा ही कुछ सीमोन की इस किताब के साथ भी हुआ. उनकी किताब द सेकंड सेक्स, यानी कि ‘स्त्री उपेक्षिता’ इस बात का बड़ा उदाहरण है. इस किताब का सार पूरे समाज को नकार देने या फिर संपूर्ण पुरुष वर्ग से शिकायत होना कत्तई नहीं है, लेकिन ये किताब ऐसे कई सच बयान करती है, जिनका सामना अधिकतर महिलाएं करती हैं. सोच कर देखा जाए तो ये सिर्फ किसी किसी एक काल, एक माहौल या फिर एक देश का सच नहीं बल्कि पूरी दुनिया का सच है और यही वजह है कि दुनिया भर के तमाम देशों में इन सबको लेकर समय समय पर क्रांतियां और परिवर्तन हुए.
पाठक का अपने लेखक के साथ जो रिश्ता होता है, वो काफी हद तक पाठक की विशिष्टताओं, उनकी उम्र, इनकी जाति उनके वर्गीय परिवेश और संस्कृति पर निर्भर करता है. सीमोन की इस किताब के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है. इस किताब में सिद्धांत और तथ्य के अलावा और भी ऐसा बहुत कुछ है, जो भावनात्मक रूप से झकझोरता है और यही वजह है कि सीमोन के साथ पाठक की आत्मीयता बढ़ जाती है. ऐसी कई महिलाएं हैं, जिन्होंने इस किताब को पढ़ने के बाद ये महसूस किया, कि सीमोन उनकी मां, बहन या वो गहरी दोस्त हैं, जिनकी गोद में मुंह छिपाकर वे रो सकती हैं. ये सच है कि किताब को पढ़ते हुए ऐसा कई बार महसूस होगा, कि लेखिक एक स्त्री के दर्द और त्रासदी को समझ रही हैं.
जिन दिनों ये किताब लिखी गई, इसने एक बड़ी आबादी को प्रभावित किया और नजाने कितने लोगों को इसके विरोध में भी लाकर खड़ा कर दिया, लेकिन आज 2023 में कोई यदि इस किताब को पढ़े किताब कुछ खास चौंकाती नहीं है. अब महिलाओं के विभिन्न पक्षों पर बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा रहा है, लेकिन सीमोन के विचार आज भी लोगों के बीच बहस का मुद्दा बन जाते हैं. किताब में प्रभा खेतान लिखती हैं, ‘हम भारतीय कई तहों में जीते हैं. यदि हम मन की सलवटों को समझते हैं, तो यह ज़रूर स्वीकारेंगे कि औरत का मानवीय रूप सहोदरा कहे जाने के बावजूद भी स्वीकृत नहीं है. स्पष्टवादिता उसका गुनाह माना जाता है.’
सीमोन द बोउवार ने जितना कुछ भी लिखा वह एक साधारण स्त्री के संदर्भ में है. उसे अपवादों और विशष्टों पर लागू करना बड़ गलती होगी. इस किताब को पढ़ते हुए सामान्य स्त्री और उसके परिवेश के बारे में समझने की सोच विकसित होती है. आज भी कई जगहों पर या फिर कहें तो कई परिवारों में स्त्री की स्थिति अधीनस्थता की है, जिसे सीमोन ने कई साल पहले ही अपनी इस किताब में जस का तस रख दिया है. किताब नारीत्व के मिथक को गहराई से टटोलती है. किताब के दूसरे भाग में स्त्री जीवन के वास्तविक तथ्यों का विशद वर्णन है. किताब के माध्यम से सीमोन ने स्त्री के जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक के उस रूप को दिखाने का दुस्साहस किया है जिसमें वो विभिन्न भूमिकाओं को निभाते हुए अन्या बना दी जाती है और उसके आगे बढ़ने की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं. साथ ही किताब में सीमोन स्त्री के स्वतंत्र विचारों की भी विवेचना करती हैं. डॉ. प्रभा खेतान ने इस किताब का हिंदी रूपांतर इसलिए भी किया ताकि पाठकों को इससे प्रेरणा मिल सके, साथ ही आत्मचिंतन के नए दरवाज़ें खुलें.
इस किताब को पढ़ते हुए एक बात तो साफ हो जाती है, कि स्त्री की स्थिति दुनिया भर में एक जैसी ही है. डॉ. प्रभा खेतान ने ‘द सेकंड सेक्स’ जैसी मुश्किल किताब का हिंदी में अनुवाद करने का जो दुस्साहस किया वह निश्चित तौर पर प्रशंसनीय और साहसिक है. उन्होंने ‘स्त्री : उपेक्षिता’ के माध्यम से ‘द सेकंड सेक्स’ को पठनीयता की हद तक सरल बनाने में अपनी प्रतिभा का भरपूर इस्तेमाल किया है.
महिला अधिकारों पर बात बिना गुस्सा हुए, बिना आक्रोश के भी की जा सकती है, इसलिए किताब कई जगह पर आक्रोश पैदा करती है, जिसकी कोई ख़ास ज़रूरत नहीं है, क्योंकि फेमिनिज़्म भी वो अधिकार है- जो बराबरी की बात करता है, ना कि औरत को पुरुष की जगह पर बैठा देना चाहता है और पुरुष को औरत बना देना चाहता है. इसलिए किताब को पढ़ते हुए आप सीमोन की कई बातों से सहमत नहीं भी होंगे और इस बात पर ज़रूर गौर करेंगे कि ‘ये कहने की ज़रूरत नहीं थी, इसके बिना भी बात को सही तरह से कहा जा सकता था.’
निसंदेह तौर पर ऐसा हो सकता है, कि आज के समय में हम सीमोन के विचारों से पूरी तरह सहमत न हों, क्योंकि हमारे आसपास ऐसी बहुत सारी चीज़ें घटित होती हैं, जो सीमोन के विचारों की कमजोरियों को साबित करने में पूरी तरह सक्षम हैं. कई महिलाएं इस बात पर हंस सकती हैं, कि हम स्त्री-पुरुष के भेद से बहुत ऊपर उठ चुके हैं, लेकिन फिर भी कई सारी औरतें हमारे आसपास ऐसी हैं, जो सीमोन के विचारों में अपना चेहरा देखती हैं. जागरुक पाठकों को इस किताब से ऐसा बहुत कुछ मिलेगा जो अब तक या तो उनकी नज़र से ओझल रहा या फिर अमूर्त.
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Tags: Book, Hindi Literature, Hindi Writer
FIRST PUBLISHED : June 16, 2023, 00:04 IST






