
बात दिमाग में ही है, लेकिन जुबान तक नहीं आ रही है. या फिर चाभी यहीं तो रखी थी, मिल नहीं रही है. इस तरह की उलझनों से तकरीबन सभी रोजाना दो-चार होते हैं. मगर अगर किसी को लगने लगे कि उसका ख़ुदा गुम हो गया. आराध्य उसे छोड़ कर कहीं चले गए. तो फिर किसी अक़ीदतमंद की क्या हालत हो सकती है! साहित्यकार तहसीन मुनव्वर ने इसी को लेकर एक जोरदार कहानी ‘खोया पाया’ रची है. कहानी छोटी लेकिन आस्था और आस्था को समझने के लिए लाजवाब है. आप भी पढ़ें यह कहानी-
तहसीन मुनव्वर की कहानी ‘खोया पाया‘
कुछ दिन से आबिद अजीब-सी तड़प और बेचैनी से घिरा हुआ था. न जाने उसे कैसे इस भ्रम ने जकड़ लिया था कि उस का ख़ुदा रूठ कर कहीं चला गया है. उसे विश्वास था कि कुछ दिन पहले तक वह हर दम उस के साथ था मगर, अचानक न जाने उस से क्या ख़ता हुई वह खो गया. उसका दुख इसलिए भी गहरा था कि वह इस गुमशुदगी की ख़बर किसी को दे नहीं सकता था. भला वह यह कैसे कह सकता था कि जो सांस की नली से भी अधिक समीप है वह खो गया है. वैसे भी जो अहसास का हिस्सा हो उस का सबूत कैसे देता. वह अगर रात और दिन के आने-जाने में उसकी निशानियां साबित करता तो वह तो सभी के लिए समान होतीं मगर उस के ख़ास अपने पास रहने का क्या सबूत था?
आबिद रह-रह कर यह विचार करता रहता कि उस पर यह अज़ाब कब उतरा होगा. एक विचार आ रहा था कि पिछले दिनों सरकारी दौरे के दौरान दफ़्तर के साथियों के साथ वह एक बड़े मंदिर चला गया था. उसे शक था होना हो वहीं कहीं उस से रूठ कर उस ने साथ छोड़ दिया होगा. मगर फिर एक दिल कहता कि उस के धर्म में सारा मामला नीयत का है. उसकी नीयत में कहीं भी पूजा में भाग लेना नहीं था, इसलिए इस तरह ‘स्ट्प्नी’ बने-बने मंदिर जाने से ख़ुदा नाराज़ कैसे हो सकता है. यह भी तो संभव है कि वह साथ ही हो मगर महसूस होना बंद हो गया हो.
ख़ुदा के खो जाने का विचार इसलिए भी आबिद पर हावी होता जा रहा था कि अब उसे इबादत में वह मज़ा नहीं आ रहा था जो पहले कभी मिलता था. दुनिया भर के विचार मौजूद होते मगर जिस की इबादत कर रहा होता वह ही नहीं होता. यही वजह थी कि आबिद को इस अहसास ने घेर लिया था कि उसे या तो ख़ुदा ने छोड़ दिया है या वह ही कहीं उसे भूल आया है. वह इसलिए भी बहुत परेशान था कि उस का सारा काम तो ख़ुदा के भरोसे चलता था. कभी-कभी तो उस पर ऐसी दीवानगी छा जाती कि दीवार से सिर टकराकर अपने गुनाहों की माफी मांगने का मन करता. वह सोचता कि अपने कपड़े फाड़कर जंगल निकल जाए और जब तक ख़ुदा वापस न मिल जाए बस्ती का रुख ही न करे. मगर जब पत्नी और बच्चों की तरफ देखता तो उसकी दीवानगी में कुछ हद तक कमी आ जाती और किसी तरह खुद को संभालता. मुश्किल यह थी कि आबिद यह बात किसी से कह भी नहीं सकता था. न जाने लोगों की प्रतिक्रिया क्या होती. लोग या तो पागल करार दे देते या फिर मरने-मारने पर उतर आते.
एक बार उस ने सोचा भी जाकर इमाम साहब से चर्चा करे मगर फिर यह सोच कर रह गया कि इमाम साहब वैसे भी इन दिनों उस से नाराज चल रहे हैं, कहीं बात का बतंगड़ न बना दें. उसे इस की वजह भी अच्छी तरह याद थी. बकरों वाली ईद से पहले वाली ईद की नमाज़ के दौरान इमाम साहब जब कुछ प्रभावशाली लोगों के लिए सैकड़ों नमाज़ियों को इंतजार करवा रहे थे तब वह बोल उठा था कि दो लोगों के लिए इतने लोगों को परेशान करना कहां तक उचित है? तब उन्होंने आबिद को बुरी तरह झिड़का था. वह क्या करता, उसे अपने स्वर्गीय पिता की बात याद आ गई थी. ऐसे ही एक अवसर पर इंतजार करते-करते वह परेशान हो गए थे और उन्होंने कहा था कि इमाम साहब को कम से कम यह तो सोचना चाहिए कि नमाज़ियों में कई बीमार लोग भी हैं.
मगर इमाम साहब ने डांटते हुए आबिद से कहा कि वह माहौल खराब करने की कोशिश न करे. उस ने सोचा मेरे बोलने से माहौल कैसे ख़राब हो गया. अगली ईद पर उस ने माहौल बेहतर बनाए रखने के लिए घर पर ही नमाज़ पढ़ ली और बच्चों को भी पढ़वा दी. ओह, अब याद आया, शायद इसी बदतमीजी से नाराज होकर उसे सज़ा दी गई है.
वह तड़पता और याद करता कि ख़ुदा ने कहां-कहां उसका साथ दिया है. बचपन में अक्सर उस के घर में भूखे रहने की नौबत आ जाती मगर अम्मां-बाबा मेहनत-मजदूरी करके कुछ न कुछ खाने को ले ही आते. बाबा तो कहते थे जब तक ख़ुदा है हमें भूखों मरना नहीं पड़ेगा क्योंकि, खाना देना तो उसी का काम है. उस ने ख़ुदा के नेक बन्दों के बारे में भी सुना था कि जब उनके घर में खाने को कुछ नहीं होता था तब वह ख़ुदा के ही अतिथि हुआ करते थे. उसने यह सब बातें पढ़ने के बाद ही अपने अंदर सहनशीलता और धैर्य पैदा किया था. थोड़ा बहुत सम्मान भी अर्जित किया था. मगर यह सब सम्मान धरा का धरा ही रह जाएगा अगर उसने किसी से जाकर कह दिया कि उस का ख़ुदा खो गया है. इमाम साहब तो उसे खा ही जाएंगे जो ईद के बाद से उसे ऐसे घूरते हैं जैसे वह ही इमाम साहब के खिलाफ इन दिनों जारी साज़िशों की धुरी हो.
आबिद दिल से मानता था कि ख़ुदा ने कदम-कदम पर उसकी मदद की थी. कई बार हादसों में बचा तो वह भी ख़ुदा ने ही बचाया. उसकी सरकारी नौकरी का मामला ऐसा अटका हुआ था कि कहीं से भी बात नहीं बन रही थी. धरती के ख़ुदाओं ने तो उसके चारों ओर नाकामी का जाल बिछा दिया था. कारण केवल इतना-सा था कि उस का विश्वास ख़ुदा में था और वह इस विश्वास की शक्ति से ही चल रहा था. जब एक ऐसा मौका आया कि उसे लगा कि अब आर या पार की बात है तब उस रात गिड़गिड़ा कर आंसुओं में तर हो कर उस ने ख़ुदा से प्रार्थना की थी कि अब तू ही है और कोई नहीं है, यह मेरे विश्वास और उनके विश्वास की बात है. उसे तो यह चमत्कार-सा ही लगता है कि आज वह सफल सरकारी नौकरी में है. उसका विरोध करने वालों को भी उस का समर्थन करना पड़ा था. यह थी उस के ख़ुदा की शक्ति..! मगर अब वह क्या करे? अब तो यह शक्ति ही रूठ गई थी.
एक दिन आबिद को पागलों की तरह कुछ खोजते देख उसकी पत्नी ने पूछ ही लिया- “आजकल आप क्या ढूंढते रहते हैं? कुछ खो गया है क्या?”
उस ने कहा- “हां, लेकिन तुम रहने दो, मैं ही ढूंढ लूंगा.”
“क्या है? पता तो चले, हो सकता है कि मैं ही कहीं रखकर भूल गई हूं.”
“नहीं-नहीं तुम्हारी चीज़ होती तो तुम भूलतीं, मगर चीज़ तो मेरी ही खोई है.”
“क्या खोया है? बताते क्यों नहीं?”
“अरे ख़ुदा खो गया है, मेरा ख़ुदा खो गया है…!”
“नाउज़ुबिल्लाह..! तौबा कीजिए, क्या बोल रहे हैं आप? कुफ़्र बक रहे हैं, कहती थी इतनी मोटी-मोटी किताबें मत पढ़ो, यह बाहर के ख़बर वाले चैनल मत देखो, अंग्रेज़ी में न जाने क्या-क्या बोल कर सबको ईसाई बना लेते हैं. मगर तुम तो दुनिया भर के अंग्रेज़ी चैनल देखते हो, एक मेरी पसंद का सीरियल नहीं देखने देते. मजाल है कि कोई ढंग की फ़िल्म पूरी देख लूं. बस रिमोट पर कब्ज़ा ऐसे जमा लेते हो जैसे अमेरिका ने, वह कौन-सा देश है जहां वह था, क्या नाम है जिसके नाम पर भाईजान ने अपने बेटे का नाम रखा था, मगर अब उस नाम से नहीं पुकारते, हां इराक़ वाला, अल्लाह करवट-करवट जन्नत दे, कैसे मारा चूहे की तरह..!”
“तुम सद्दाम हुसैन की बात कर रही हो?”
“हां वही.”
“वह भी ज़ालिम था.”
“जो भी था अपना देश तो संभाले हुए था, आपने तो सब बर्बाद कर दिया.”
“तुम क्या समझोगी यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बातें हैं.”
“अच्छा तो समझा दो.”
“देखो, मेरे मुंह मत लगो मैं ख़ुद परेशान हूं, तुम्हें मेरी तड़प से अंदाज़ा नहीं हो रहा?”
“इसीलिए तो बात कर रही हूं ताकि तुम्हारा बोझ हल्का हो जाए.”
“ख़ुदा के लिए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो, मैं खुद ढूंढ लूंगा. तुम जरा मेरी अंडरवियर खोज दो जो कई दिन से ग़ायब है.”
“अरे मिल गई, वह अपना दीनू पहन रहा था, अपनी समझ कर.”
कोई और दिन होता तो आबिद, नौकर की अच्छी खबर लेता जैसा कि कुछ दिन पहले किया था. घर में दफ़्तर के कुछ साथी आ गए थे और यह साहब बीमारी का बहाना बनाकर पेट पकड़ कर लेट गए. बार-बार बुलाने पर भी नहीं आए. दफ़्तर के साथियों के सामने ऐसा अपमान, आबिद से बर्दाश्त नहीं हुआ. बस गुस्सा आ ही गया और फिर कुछ दिखाई नहीं दिया. पहली बार उसे वह मार मारी कि कई दिन उठ नहीं पाया था. मगर आजकल तो आबिद की खोज ही कुछ और थी जिसे वह अंडरवियर के नाम पर बर्बाद नहीं करना चाहता था. इसलिए उस ने बस इतना ही कहा- “अब अंडरवियर उसे ही दे दो.”
पत्नी से बात करने के बाद आबिद की परेशानी कम होने की जगह और बढ़ गई. अब पत्नी उसकी तड़प देखती और आसमान की तरफ हाथ उठाकर अपनी क़िस्मत को कोसती और आबिद उस पल को कोसता जब उस ने पत्नी को अपना राज़दार बनाया था. इन दिनों उस ने दफ़्तर से भी छुट्टी ले ली थी और घर से बाहर निकलना लगभग छोड़ दिया था कि ख़ुदा साथ न होने से कहीं कोई अनहोनी न हो जाए. मगर घर पर रहना तो अब और भी अधिक पीड़ा का कारण बनता जा रहा था. एक दिन उसे घर से निकलने का जब उसकी पत्नी ने ही मौक़ा दिया तो वह तुरंत तैयार हो गया.
वह सुबह की नमाज़ पढ़ कर आबिद के पास आ बैठी और सहानुभूति से कहने लगी- “सुनिये कई दिन हो गए हैं शेख़ बाबा की दरगाह पर नहीं गए हैं, चलिए वहां जाते हैं. आज जुमेरात (गुरुवार) है, वहां क़व्वाली सुनेंगे. तो हो सकता है आपकी परेशानी दूर हो जाए.”
उस ने मन ही मन सोचा कि यह विचार बुरा नहीं है और पत्नी के साथ दरगाह जाने को तैयार हो गया. दरगाह पहुंचकर उस ने मज़ार पर फूल चढ़ाए और काफी देर तक यूं ही आकाश को तकता रहा. न जाने क्या बात थी कि आज उस का दरगाह में भी दिल नहीं लग रहा था. उसने पत्नी को वहीं बैठे रहने का इशारा किया और दरगाह से बाहर आ गया. दरगाह की सीढ़ियों उतरते हुए उस ने कई भिखारियों को हाथ फैलाए देखा तो सोचा- “यह मुझे जाते हुए क्यों नहीं दिखाई दिए, भिखारी यहां आने वालों से क्यों मांगते हैं, यहां आने वाले तो ख़ुद मंगते हैं, वह ख़ुद मांगने आते हैं, मंगतों से मांगना तो घाटे का सौदा है.”
यह सोचते हुए भी उस ने जेब में हाथ डाला और जो रेज़गारी घर से लाया था एक-एक कर के वहां भिखारियों में बांटने लगा. ऐसा करते हुए वह सीढ़ियां उतरता जा रहा था. आख़री सीढ़ी पर उस ने देखा एक घायल बूढ़ा भिखारी बैठा हुआ है जिस के पैर के घाव में पीप पड़ गई थी और उस पर मक्खियां भिनभिना रही थीं. आबिद से उधर देखा नहीं गया. इसने उसे भीख देकर जल्दी निकल जाने के लिए जेब में हाथ डाला तो उस का हाथ ख़ाली रह गया. इस भिखारी तक आते-आते सब रेज़गारी समाप्त हो चुकी थी. जेब से खाली हाथ बाहर आता देख बूढ़े भिखारी ने जब निराशा से उसे देखा तो आबिद के दिल में जैसे कुछ चुभ-सा गया.
बूढ़े भिखारी को कुछ न दे पाने की शर्मिंदगी से उसकी चिंता और बढ़ गई. वह बेख़याली में सड़क पार करने लगा कि अचानक ब्रेक लगने की ज़ोरदार आवाज ने उसे चौंका दिया. वह कुछ समझता इस से पहले ही एक कार झटके खाती हुई उस के सामने रुक गई. कार की टक्कर से ख़ुद को बचाने के लिए वह एक ओर हुआ तो पीछे से तेजी से आ रही एक मोटर साइकिल उसे अपने साथ सड़क पर घसीटने लगी. मोटर साइकिल सवार ने खुद को गिरने से बचा लिया और तेज़ी से खुद को संभालता हुआ उसी गति से बिना रुके आगे निकल गया. उस ने देखा कि आसपास के लोग कार वाले को घेर कर खड़े हो गए हैं और उसे गाड़ी चलाने के संस्कार याद दिला रहे हैं. उस ने खुद को किसी तरह संभाला और चीख़ कर भीड़ को रोका जो चालक को मारने ही जा रही थी. उस ने कहा- “ग़लती उनकी नहीं मेरी है, उन्हें जाने दीजिए.”
“भाई साहब आपके पैर से तो खून निकल रहा है.”
जब किसी ने कहा तब उसकी नजर अपनी चप्पल पर गई जो खून में सनी हुई थी. उसने धीरे से अपनी पेंट के पायेंचे ऊपर किए तो देखा घुटने से नीचे उस का पैर बुरी तरह छिला हुआ था. अब उसे दर्द का भी एहसास हो रहा था. कोई बोला- “सामने एक क्लीनिक है, वहां से ड्रेसिंग करवा लीजिये.”
कुछ लोग उसे सहारा देने के लिए आगे बढ़े मगर आबिद ने उन्हें रोक दिया और दर्द सहन करता हुआ क्लीनिक की ओर जाने लगा. कार वाला अब तक संभल चुका था.
कहने लगा- “चलिए, मैं छोड़ दूं.”
उस ने कहा- “नहीं आप जाइए, ख़्वामख़्वाह मेरे कारण आपका समय ख़राब हो गया.”
“अरे साहब, दोनों का ही समय ख़राब था, बस भगवान की कृपा हो गई.” कार सवार की यह बात सुन आबिद मुस्कुराने लगा. वह लंगड़ाता हुआ क्लीनिक पहुंचा. ड्रेसिंग के बाद डॉक्टर ने पूछा कि घर में मरहम पट्टी का सामान है या नहीं. उस ने “नहीं” में जवाब दिया.
“तो आप ऐसा कीजिए, डीटोल, मरहम, पट्टी और यह रूई रख लीजिए. ख़ुद ही सफाई करके ड्रेसिंग कर लीजिएगा, आराम कीजिएगा और घाव को पानी से बचाइयेगा.”
वह क्लीनिक में ही था कि उस के फोन पर क़व्वाली की धुन बज उठी. उस ने जल्दी से फ़ोन उठाया। “कहां हैं आप, वह आप वाला निज़ामी क़व्वाली शुरू करने वाला है. ‘तुम एक गोरख धंधा हो’.”
“आ रहा हूं.”
उस ने पहले सोचा पत्नी को दुर्घटना के बारे में बता दे लेकिन यह सोच कर वह ख़्वामख़्वाह परेशान हो जाएगी, कुछ बोला नहीं. उस ने डॉक्टर की फ़ीस अदा की और धीरे-धीरे लंगड़ाता हुआ दरगाह की ओर बढ़ने लगा।.जैसे ही सीढ़ियों तक पहुंचा उसे फिर वह बूढ़ा भिखारी दिखाई दिया जिस तक पहुंचते-पहुंचते उस की जेब की रेज़गारी खत्म हो गई थी. डाक्टर की फ़ीस देने के कारण उस के पास खुले पैसे हो गए थे. उस ने जेब में हाथ डाला और कुछ पैसे निकाल कर भिखारी के हाथ पर रखने लगा. तभी बूढ़े भिखारी ने हाथ पीछे खींच लिया और दर्द से बिलबिला कर अपनी चोट पर बैठी मक्खी उड़ाने लगा. उसी समय उसे भी अपनी चोट से टीस-सी उठती महसूस हुई. हाथ के पैसे सड़क पर ही गिर गए थे. बूढ़ा भिखारी दर्द से कराहते हुए अपने घाव से मक्खियां उड़ाता रहा. न जाने उसे क्या हुआ कि अचानक उस ने क्लीनिक से लिया मरहम पट्टी का सामान ज़मीन पर बिखेर दिया और उसमें से डीटोल निकालकर बूढ़े के घावों को साफ़ करने लगा. भिखारी और आस-पास के लोग उसे आश्चर्य से देखने लगे. तभी आबिद की जेब में रखा फ़ोन चीख उठा. ‘तेरी हर इक अदा को मैं जान गई न, रूप बदला तो क्या पहचान गई न’. क़व्वाली रिंगटोन में लगातार बज रही थी मगर वह फ़ोन नहीं उठा पा रहा था. आबिद ने भिखारी के घावों को अच्छी तरह साफ़ किया, मरहम लगाया और पट्टी बांध दी. इसके बाद उस ने धरती पर गिरे पैसे बटोरे और बूढ़े भिखारी के हाथ पर रख दिए. बूढ़े ने कुछ कहा नहीं बस उसे आश्चर्य से देखता रहा.
“ओह हो, तुम यहां हो, फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे थे, किसी ने बताया कोई दुर्घटना हुई है सड़क पर. क़व्वाली छोड़कर दौड़ी चली आई कि कहीं ख़ुदा न ख़ासता तुम ही न हो. ओह यह तुम्हारे ख़ुन कैसा लगा है? भिखारी के पास क्यों बैठे हो? समझ है कि नहीं?” इतना कहते-कहते पत्नी की कुछ-कुछ समझ तो आ ही गया था कि आबिद के साथ ही हादसा हुआ है.
“चलो घर चलते हैं.” उस ने कहा और उसे सहारा देकर उठाने लगी.
“भगवान की कृपा हो गई.” ऑटो से घर लौटते हुए वह कार वाले की बात याद करके हँसने लगा. पत्नी ने उसे आश्चर्य से देखा. उसके चहरे पर चिंता की झलक साफ पढ़ी जा सकती थी क्योंकि अब वह बोल नहीं रही थी. तभी आबिद के घाव से फिर टीस उठी. उसने सिसकी ली और उसे वह बूढ़ा भिखारी ऑटो में अपने साथ बैठा दिखाई दिया. वह भिखारी के घावों पर मरहम लगा रहा था और भिखारी उस के घावों पर. कुछ देर बाद बूढ़ा भिखारी कहीं ग़ायब हो गया मगर उसे लगा कोई उस के साथ है.
“साथ हो?”
“हां… साथ ही हूं.” पत्नी ने जवाब दिया.
“तुमसे नहीं, किसी और से कह रहा हूं.”
आबिद के चेहरे पर एक मुद्दत से खोया सुकून वापस आ चुका था…!
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लेखक तहसीन मुनव्वर
बहुमुखी प्रतिभा के धनी तहसीन मुनव्वर उर्दू के जाने-माने साहित्यकार हैं. उनके शायरी के दो संग्रह ‘धूप चांदनी’ और ‘सहरा में शजर’ प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली उर्दू अकादमी ने उनके कहानी संग्रह ‘मासूम’ के लिए उन्हें पुरस्कृत किया था. वह उर्दू अकादमी दिल्ली की कार्यकारिणी समिति के सदस्य भी रहे हैं. आप उर्दू समाचार वाचक और एंकर के रूप में आकाशवाणी, दूरदर्शन तथा ईटीवी से भी जुड़े रहे हैं. तहसीन मुनव्वर की उर्दू पुस्तक ‘किताब अर्ज़ है’ एक बहुत ही चर्चित कृति है. इसमें उन्होंने उर्दू. हिंदी और अंग्रेज़ी की 36 किताबों की समीक्षा अपने अलग अंदाज़ में की है.
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Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 16, 2023, 17:32 IST






