
धर्मवीर शर्मा/गुरुग्राम. हर साल चैत्र महीने की कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्ठमी को शीतला देवी की पूजा की जाती है. शीतला माता को चेचक रोग की देवी भी कहते हैं. शीतला माता के पर्व को हिंदू समाज में बास्योड़ा नाम से जाना जाता है. इस पर्व के एक दिन पहले शीतला माता के भोग को तैयार किया जाता है और दूसरे दिन बासी भोग को माता शीतला को चढ़ाया जाता है. माना जाता है कि शीतला देवी की पूजा-अर्चना से चेचक नहीं होता. छोटे बच्चों को चेचक से बचाने के लिए विशेषकर शीतला देवी की पूजा की जाती है.
स्कंद पुराण में शीतला माता से जुड़ी एक पौराणिक कथा का वर्णन मिलता है. जिसमें बताया गया है कि शीतला देवी का जन्म ब्रह्माजी से हुआ था. शीतला माता को भगवान शिव की अर्धांगिनी शक्ति का ही स्वरूप माना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, देवलोक से देवी शीतला अपने हाथ में दाल के दाने लेकर भगवान शिव के पसीने से बने ज्वरासुर के साथ धरती लोक पर राजा विराट के राज्य में रहने आई थीं लेकिन, राजा विराट ने देवी शीतला को राज्य में रहने से मना कर दिया.
राजा विराट के व्यवहार से माता हुई थी क्रोधित
राजा के इस व्यवहार से देवी शीतला क्रोधित हो गई. शीतला माता के क्रोध की अग्नि से राजा की प्रजा के लोगों की त्वचा पर लाल लाल दाने हो गए. लोगों की त्वचा गर्मी से जलने लगी थी. तब राजा विराट ने अपनी गलती पर माफी मांगी. इसके बाद राजा ने देवी शीतला को कच्चा दूध और ठंडी लस्सी का भोग लगाया, तब माता शीतला का क्रोध शांत हुआ. तब से माता देवी को ठंडे पकवानों का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है. गुरुग्राम के शीतला माता मंदिर में न सिर्फ हरियाणा से बल्कि दूसरे राज्यों से भी भक्त पूजा-अर्चना के लिए आते हैं. मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है.
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FIRST PUBLISHED : May 27, 2023, 20:59 IST









