
ब्रह्माण्ड के सबसे रहस्यमयी पहेलियों में से एक उसका विस्तार है. सौ साल से भी ज्यादा समय से हमारे वैज्ञानिक यह जानते हैं कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है लेकिन उसकी वजह का उन्हें स्पष्ट तौर पर पता नहीं चल सका है. कई सिद्धांत जरूर दिए गए हैं. लेकिन उन्हें अभी तक सिद्ध नहीं किया जा सकता है. ब्रह्माण्ड के विस्तार का मापन हबल कॉन्स्टेंट के जरिए किया जाता है और इसके मान में समय समय पर संशोधन और परिशोधन भी होता रहता है. नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस हबल कॉन्स्टेंट का मान निकलने के लिए नई तकनीक का उपयोग किया है.
तारे से आने वाली अलग-अलग रोशनी
यूनिवर्सिटी ऑफ मिनोसोटा के पैट्रिक केली की अगुआई में प्रस्तुत किए गए दो शोधपत्रों में इस तकनीक के बारे में बताया गया है जिनका प्रकाशन साइंस और द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में हुआ है. इसमें विस्फोटित तारे से पृथ्वी की आने वाले प्रकाशों का अध्ययन किया जाता है तो ब्रह्माण्ड के विस्तार के कारण अलग-अलग रास्तों से अलग-अलग समय पर पृथ्वी तक पहुंचते हैं. इन्हीं का उपयोग हलब कॉन्स्टेंट की गणना के लिए किया गया.
तारे की मूल चमक का निर्धारण
1908 में हेनरीटा लियाविट ने एक तरह के तारे की मूल चमक के मापन का तरीका निकाला था जिसे सीफिड वेरिएबल कहते हैं. जहां पृथ्वी पर दिखने वाली तारे की चमक उसकी दूरी और अन्य कारकों पर निर्भर करती है. सिफिड तारे नियमित चक्र में टिमटिमाते हैं, लिएविट ने दर्शाया कि मूल चमक का इस चक्र की लंबाई सें संबंध है.
सिफिड तारे या मानक कैंडल
इसी आधार पर वैज्ञानिक सिफिड तारों को मानक कैंडल के तौर पर उपयोग करते हैं जो ऐसे पिंड हैं जिनकी मूल चमक ज्ञात है और इसलिए उनकी दूरी का मापन हो सकता है. दूर होने पर प्रकाश की चमक कम होने लगती है. 1929 में एडविन हबल ने दूसरी गैलेक्सी में ऐसे सिफिड तारों की संख्या के साथ उनकी दूरी का पता लगाया और उन दूरी के आधार पर दूसरे मापन किया जिससे ब्रह्माण्ड के विस्तार का पता चल सकता था.
और भी हैं तकनीक
मानक कैंडल पद्धति बहुत कारगर है जिससे ब्रह्माण्ड के बहुत सारे हिस्से की जानकारी मिली है, खगोलविद कई तरह अलग-अलग कैंडल देखते हैं जिससे वे और ज्यादा दूरी का पता लगा सकें. इसी तरह की एक तकनीक में ला प्रकार के सुपरनोवा के विस्फोट के साथ सिफिड का उपयोग किया गया था. इसके अलावा हबल कॉन्स्टेंट मापने के लिए कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड जैसी तकनीक का भी उपयोग होता है जिसमें बिग बैंग के ठीक बाद पैदा हुए प्रकाश का इस्तेमाल होता है.
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Tags: Space
FIRST PUBLISHED : May 14, 2023, 10:04 IST









