प्राग की गलियों में प्रवेश करते ही दो साये आपके साथ हो लेते हैं. आप उनसे मुक्त होना चाहते हैं, लेकिन वे आपको अपनी निगाह से यह शहर दिखाना चाहते हैं. एक अपनी भूमि पर अपमानित होकर आया था, लेकिन प्राग ने उसे अपना सरताज बनाया. दूसरा, यहीं जन्मा था लेकिन प्रागवासियों ने उसे दुत्कार दिया.
मोत्सार्ट और उनकी मृत्यु के एक सदी बाद जन्मे काफ़्का. जर्मन इतिहासकार और काफ्का के जीवनीकार आर्थर शुरिग ने लिखा है कि “बोहेमिया की राजधानी (प्राग) में पहली बार मोत्सार्ट का काम समझा गया, सराहा गया, प्रशंसित हुआ.
प्राग का ऐतिहासिक एस्टेट्स थिएटर जहाँ मोत्सार्ट के महान ऑपेरा डॉन गिओवानी का प्रीमियर हुआ था. फोटोः आशुतोष भारद्वाज
अगर किसी शहर को मोत्सार्ट का शहर कहलाने का अधिकार है, तो यह (उनकी जन्मस्थली) सॉल्ज़बर्ग नहीं जिससे वे नफ़रत करते थे, विएना नहीं जिसने उन्हें भूखा मरने के लिये छोड़ दिया और किसी अनाम कब्र में दफ़ना दिया, यह सिर्फ़ उनका सुनहरा प्राग है.”
इन दोनों हस्तियों का जीवन ओल्ड टाउन स्क्वायर पर आकर मिल जाता है. मोत्सार्ट के महानतम ऑपेरा डॉन जिओवानी का प्रीमियर प्राग के ऐतिहासिक एस्टेट्स थिएटर में हुआ था- काफ़्का के घर से बमुश्किल पाँच मिनट पैदल. कुछ बरस पहले हारुकी मुराकामी ने अपने उपन्यास किलिंग कमेंडाटोर में जिओवानी की कथा की पुनर्रचना की थी.
काफ़्का से एक सदी पहले यानि मोत्सार्ट के प्राग को ऐसे समझें कि यहाँ की लाइब्रेरी में रखी एक मोटी सन्दर्भ किताब, जिसे कई चेक लेखकों ने मिल कर लिखा है, कहती है कि अठारहवीं सदी में इतने अधिक संगीतकार बोहेमिया में रहते थे कि उन्हें अन्य देशों की ओर पलायन करने के लिये बाध्य होना पड़ा.
काफ़्का हाउस जहाँ उनका जन्म हुआ था. फोटोः आशुतोष भारद्वाज
और काफ़्का की जन्मस्थली को ऐसे समझें कि उनके घर की एक खिड़की से प्राग कासल दिखाई देता है. इस खिड़की के नीचे जाती छोटी-सी गली कापरोवा पार कर व्लतावा नदी आ जाती है. चेक पेंटर योसेफ़ मानेस के नाम पर बने मानेस पुल को पार करिये और कासल की चढ़ाई शुरू. दूसरी खिड़की से ओल्ड टाउन का क्लॉक टावर दिखाई देता है, जहाँ एक प्राचीन खगोलशास्त्रीय घड़ी टंगी हुई है, आज भी इसके पुर्जे काम कर रहे हैं.
रोमन साम्राज्य की राजधानी रहा प्राग मध्य यूरोप का दमकता चेहरा है – और ओल्ड टाउन पिछले एक हजार वर्षों से समूचे चेक गणराज्य का पहला और प्रतिनिधि नगर है. यूरोपीय सभ्यता के इस दिव्य केंद्र में उस इंसान का जन्म हुआ था जिसका लेखन उसी सभ्यता पर यक्ष प्रश्न है.
मुझे लगता था कि इस घर को रेजीडेंसी में तब्दील करने के बाद इसकी रंग-ए-सूरत बदल गयी होगी. लेकिन नहीं, इस घर की पुरानी तस्वीरें फ्रांत्स काफ़्का म्यूजियम में देखिये, डेढ़ सौ वर्षों के बाद भी यह घर लगभग वही दिखाई देता है.
प्राग स्थित काफ़्का म्यूजियम. फोटोः आशुतोष भारद्वाज
काफ़्का का बचपन इस शहर की रौनक में डूबा होना चाहिये था. कासल और व्लतावा उनके जीवन में उम्मीद की तरह आने चाहिये थे. लेकिन नहीं, क्योंकि उनका जन्म स्थान उन दिनों ज्यूइश क्वार्टर या यहूदी बस्ती बन चुका था. यूरोप के बहुसंख्यक ईसाई यहूदियों के खिलाफ़ आ चुके थे. इसलिए प्राग का किला काफ़्का के उपन्यास द कासल में एक भीषण कैदखाने के रूप में अवतरित हुआ.
प्रख्यात कलाकारों की जन्म और कर्मस्थली इस यहूदी बस्ती को काफ़्का अपने सामने उजड़ते देख रहे थे. इसका एक विलक्षण प्रमाण है, उनके घर के ठीक बांयीं ओर से निकलती परिश्का सड़क जो ओल्ड टाउन स्क्वायर से शुरू होने वाली पहली सड़क भी है. इस स्क्वायर से निकलती गलियाँ आपको झटके से भिन्न कालखण्ड में ले आती हैं. बरोक शैली, गोथिक शैली और आर्ट नूवो से रोशन इन गलियों की भव्य इमारतों से गुजरते वक्त अनेक कालावधि आपकी इन्द्रियों को एक साथ आग़ोश में ले लेती हैं. भले इन गलियों में टूरिस्टों के लिये बार और कैफ़े आ गये हैं, एक गली में ‘म्यूजियम ऑफ़ सेक्स’ भी है, लेकिन किसी अन्य युग के यात्री होने का, टाइम-ट्रेवल का एहसास बना रहता है.
इसके बरअक्स परिश्का (पेरिस की) आपको उदास छोड़ जाती है. यहूदी बस्ती को जाती इस सड़क पर बनी इमारतों को तोड़कर नये निर्माण उन्नीसवीं सदी के अंत में हुए जब पेरिस और उसका फैशन अंतिम मानदण्ड हुआ करता था. इसलिए इस सड़क पर फ्रेंच घड़ियों, जेवर और पोशाकों के अपार कीमती शोरूम हैं. इसकी आधुनिक कौंध ओल्ड टाउन के मद्धिम रोमांस को धुंधला देती है. ख़ासकर जब आपको मालूम होता है कि ये शोरूम यहूदी बस्तियों को उजाड़ कर बनाये गये थे.
इन सड़कों पर आपको कई इमारतों के सामने फर्श पर पीतल के ब्लॉक खुदे हुए मिल जायेंगे. इन पर उन यहूदियों के नाम, जन्म और मृत्यु-तिथि दर्ज हैं, जो नाज़ियों द्वारा जबरन कंसंट्रेशन कैंप में भेजे जाने से पहले यहाँ रहा रहते थे.
लेनिन का एक निबंध है, ‘साम्राज्यवाद पूंजीवाद के विकास की चरम अवस्था है’. रामचंद्र गांधी ने इस प्रस्तावना को आगे बढ़ाते हुए बीसवीं सदी के मध्य यूरोप पर टिपण्णी करते हुए कहा था कि नस्लभेद द्वैत भाव, यह भाव कि वह मेरा विलोम है, की चरमावस्था है.
प्राग में काफ़्का की मूर्ति. फोटोः आशुतोष भारद्वाज
अपने जीवनकाल में यहूदी होने की पीड़ा जीते आये काफ़्का का लेखकीय पुनर्स्थापन हिटलर की पराजय के बाद हो जाना चाहिये था. लेकिन हिटलर के परास्त होने के बाद यूरोप में युद्ध भले ख़त्म हुआ, समूचा महाद्वीप दो विचारधारा, दो जीवनशैली के बीच भीषण द्वंद्व में फंस गया. युद्ध से पहले यूरोप ने अपने शत्रु धर्म और नस्ल की नींव पर गढ़े थे, पचास के दशक से द्वेष और संदेह के नये आधार खड़े हो गये. चेकोस्लोवाकिया की साम्यवादी सरकार ने काफ़्का के लेखन को त्याज्य माना. चेक समुदाय का उन पर ध्यान आखिरकार नब्बे के दशक के बाद गया और बहुत जल्द काफ़्का प्राग की धरोहर बन गये.
अक्सर तत्कालीन यूरोप के यहूदियों की तुलना वर्तमान भारतीय मुसलमानों से की जाती है. यूरोप के यहूदी कला, विज्ञान, संगीत और गणित के विद्वान थे. उनके पास बेशुमार बौद्धिक और आर्थिक शक्ति थी. काफ़्का धार्मिक अल्पसंख्यक थे, लेकिन वह चेक के बजाय ऑस्ट्रियन-हंगरी साम्राज्य की राजभाषा जर्मन में लिखते थे. भारतीय मुसलमान प्रायः निर्धन-निर्बल हैं, सत्ता के केन्द्रों से लगभग अनुपस्थित हैं, उनकी अपनी भाषा सिमट रही है. काफ़्का को कुछ दशकों बाद प्राग ने अपना लिया, क्या भारतीय सत्ता कभी अपने मुसलमान लेखक-कलाकारों की जन्म-स्थली को राष्ट्रीय प्रतीक मानेगी? उनके पैतृक घर को दूर देश के लेखकों के लिये रेजीडेंसी में परिवर्तित करेगी? यूरोप के यहूदी हिटलर के जाने के बाद वापसी कर सकते थे. भारतीय समाज के लिये यह दिन कब आयेगा?






