
कृष्ण गोपाल द्विवेदी/बस्ती. कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी ‘ऑल इज वेल’ जिसमें अभिनेता आमिर खान लोगों को समझाते दिखे थे कि मां बाप या परिजन को बच्चों के ऊपर अपने सपने नहीं थोपना चाहिए. लेकिन समाज इस विचारधारा के विपरीत चल रहा है. मां-बाप और परिजन अपने सपने अपनी औलादों पर थोप रहे हैं. जिसका नतीजा है कि बच्चे मानसिक रोग के शिकार हो रहे हैं.
बस्ती जनपद के जिला अस्पताल में प्रतिदिन मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में 4-5 मरीज ऐसे आ रहे हैं, जिनकी उम्र 15-25 वर्ष है. ये सभी किसी न किसी कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी कर रहे होते हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस तरह की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए इनके विशेष प्रबंधन की सलाह देते हैं.
प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव
मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ एके दुबे ने बताया कि इस समय युवा मरीज ज्यादा आ रहे हैं. ये युवा किसी ने किसी कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि अभी हाल ही में एक ऐसी मरीज आई थी, जिसकी उम्र 19 साल थी. उसे घबराहट, सांसें तेज होना, बेहोशी जैसी समस्या थी. घरवालों ने सारी जांच करवा ली. सारी रिपोर्ट नेगेटिव निकली. तब वे लड़की को मेरे पास लेकर आए और जब मैंने उससे बात की तो पता चला की वो नीट की तैयारी कर रही है. घरवाले उसको डॉक्टर बनाना चाहते हैं, रिश्तेदार आने पर भी वो लोग यही कहते हैं. इन सबसे वह लड़की काफी दबाव में थी. वह डिप्रेशन की शिकार हो गई थी. डॉ दुबे ने बताया कि जब मैंने उसका टेस्ट लिया तो पता चला कि वो पढ़ने में काफी कमजोर है, फिर ये बात मैंने मरीज के घरवालों को बताई. दो महीने की ही दवा में वह ठीक हो गई.
खुद न करें क्षमता का आकलन
डॉ एके दुबे ने बताया कि घरवालों को खुद बच्चों की क्षमता का आकलन नहीं करना चाहिए. उनको उनकी रुचि के हिसाब से सब्जेक्ट चुनने देना चाहिए. इसके लिए घरवालों को बच्चों के टीचर से लेकर मनोवैज्ञानिक तक से भी राय मशवरा करना चाहिए. जिससे बच्चों की मानसिक क्षमता का आकलन हो सके.
.
Tags: Basti news, Mental diseases, Students
FIRST PUBLISHED : May 27, 2023, 10:17 IST









