प्रयोगशाला में बच्चों का पैदा होना जल्द हो सकती है हकीकत!

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इंसान अपनी पैदाइश पर कितना काबू कर सकता है और उसे कितना काबू में करना चाहिए. यह एक बहुत बड़ी बहस का विषय है. क्या हम इंसानों को नर्सरी या प्रयोगशाला में पैदा कर सकते हैं. सुनने में अजीब लग रहा हो, लेकिन जापानी वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में मानव शिशुओं की पैदाइश को हकीकत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. इससे वे अब बांझपन, एक ही लिंग के लोगो के माता या पिता बनने की समस्या से निजात पाना संभव हो सकेगा. यह शोध मानव अंडे और स्पर्म के जरिए प्रयोगशाला के वातावरण में कृत्रिम गर्भ के अंदर भ्रूण विकसित करने में सफलता दिला सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

क्यूशू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कात्सूहिको हायाशी इस शोध की अगुआई कर रहे हैं. वे पहले ही इस प्रक्रिया को चूहों में सिद्ध कर चुके हैं, उनका अनुमान है कि यह तकनीक अगले पांच सालों में इंसानों के लिए अपनाई जा सकती है. लेकिन इस प्रक्रिया में एक विवाद भी है. इससे कई तरह के नैतिक सवाल खड़े हो जाएंगे. इसका मतलब है कि किसी भी उम्र की महिला मां बन सकती है बच्चा हासिल कर सकती है और इससे कई तरहके जैविक, सामाजिक, नैतिक सवाल खड़े होंगे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay) इस तरह के कृत्रिम मानव शुक्राणु और अंडो का निर्माण कुछ लोगों माता पिता को अपने बच्चों को अनुवांशकीय तौर पर कांट छांट करवाने के लिए प्रेरित कर सकता है और इसके लिए वे जीन एडिंटिंग उपकरणों का उपयोग करने के लालच में आ सकते हैं जिस पर पहले से ही बहुत तीखी बहस चल रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons) इस तकनीक के बारे में बात करते हुए डॉ हायाशी और उनकी टीम बताया कि हाल ही में उन्होंने सात चूहे ऐसे बनाए हैं जिनके दो नर जैविक अविभावक हैं. उन्होंने इसके लिए नर चूहे की त्वचा की कोशिकाओं से एक अंडा बनाया और उसका निषेचन किया . इसके बाद की तकनीक, जिसे इन विट्रो गैमोटोजेनेसिस (आईवीजी) कहते हैं, जिसमें मानव प्रजनन की बड़ी क्षमता छिपी है. इसमें व्यक्ति के खून या त्वचा से कोशिकाएं निकाली जाती हैं और उन्हें प्लूरी पोटेंट स्टेम सेल में रीप्रोग्राम किया जाता है. यह स्टेम कोशिका शरीर की किसी भी कोशिका में डाली जा सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock) प्लूरी पोटेंट स्टेम सेल का उपयोग भ्रूण को बनाने में किया जाता है और उसे महिला के गर्भ में डाल दिया जाता है. अभी तक वैज्ञानिक इंसानी अंडा और शुक्राणु इस तरह से बनाते आए हैं. लेकिन एक सक्षम भ्रूण बनाना एक बड़ी बाधा बनी हुई है. डॉ हायाशी का कहना है कि अंडे जैसी कोशिका के उत्पादन में पांच साल का समय लग सकता है,लेकिन वे चेतावनी भी देते हैं कि डॉक्टरों द्वारा इसके क्लीनीकल उपयोग में 10 से 20 साल का समय भी लग सकता है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर हेनरी ग्रीली का भी यही ऐसा ही कुछ अनुमान है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock) लेकिन इस तकनीक से कई उम्मीदें भी जुड़े हैं. कई युगल माता पिता बनने में चिकित्सकीय तौर पर सक्षम नहीं हैं और अमेरिता में 10 युगलों में से एक युगल जो इस तरह की समस्या से जूझ रहे हैं उनक लिए यह तकनीक वरदान हो सकती है. वहीं दूसरी तरफ एक ही लिंग के (समलैंगिंक) युगल भी इस तकनीक से अविभावक बन सकते हैं जो इस समय आईवीएफ, स्पर्म या अंडाणु दान, या फिर सेरोगेसी पर निर्भर हैं. लेकिन इस तकनीक के खतरों की भी कम बातें नहीं होती हैं जिसें डिजाइनर बेबी की चुनौतियों के साथ कई कानूनी चुनौतियां भी सामने आएंगीं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

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Author: Up Head Line

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